खास-मेहमान

जौ की खेती…कृषि वैज्ञानिक SN SINGH से apnamau से बातचीत पर आधारित

बिल्थरारोड / बलिया। विश्व के अंतर्गत फसलों की विविधताओं में भारत का प्रथम स्थान है। हमारे देश में 166 फसल की प्रजातियां हैं जिनमें कुछ ऐसी हैं जो पोषक तत्वों एवं औषधीय गुणों से भरपूर हैं। इनमें से जो भी एक है। जौ का विश्व में अनाज उत्पादन में चौथा स्थान है तथा कुल अनाज उत्पादन का 7% हिस्सेदार है। विश्व के कुछ देशों में आज भी जौ को मुख्य भोजन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। मोरक्को देश विश्व में जौ का सबसे बड़ा उपभोक्ता है तथा इथिवोपिया में भी जौ का भोजन में 60 फीसदी की हिस्सेदारी है। भारत में जौ के कुल उत्पादन का 75% पशु आहार के लिए 20% माल्ट बनाने के लिए तथा केवल 5% ही भोजन के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी लाभकारी है
कृषि वैज्ञानिक एसएन सिंह का कहना है कि वर्तमान में भोजन के रूप में जौ कि महत्ता बढ़ रही है। जौ का लगातार सेवन हृदय संबंधी रोगों, मधुमेह के जोखिम को कम करने, पथरी में लाभकारी तथा वजन घटाने में काफी असरदार साबित हुआ है। जौ में रेशा भरपूर होता है जो एक तरह का कार्बोहाइड्रेट होता है। रेशे दो तरह के होते हैं। एक घुलनशील तथा दूसरा अघुलनशील। घुलनशील रेशे 3 से 20 फीसदी तक होते हैं जो कि अन्य अनाजों की तुलना में अधिक हैं।
घुलनशील रेशे जैसे बीटा- ग्लूकान, पेक्टीन, तथा कुछ सेमीसेलूलोज स्वास्थ्य के लिए काफी लाभकारी है। रेशे कोलेस्ट्रोल को कम करते हैं। जौ में बीटा-ग्लूकान की मात्रा 2 से दस प्रतिशत जो गेहूं से अधिक है। बीटा- ग्लूकान की एक और श्रेष्ठता है कि जौ के दानों में यह समान रूप से पाया जाता है परंतु अन्य अनाजों में दानों के बाहरी परतों में ही सीमित रहता है जो कि प्रसंस्करण में चोकर के साथ निकल जाता है। जो कि ऊर्जा 193 किलो कैलोरी होती है
पाए जाने वाले पोषक तत्व
प्रोटीन, सोडियम, कार्बोहाइड्रेट, जिंक, नाइसिन, रेशा कॉपर, पैंटोथेनिक अम्ल, कैल्शियम, मैंगनीज, फोलेट, आयरन, सेलेनियम, विटामिंस बी-6, ए, ई, के, मैग्नीशियम, थायोमीन, फास्फोरस, रिबोफ्लेविन एवं पोटैशियम।
बुवाई का समय
जौ की बुवाई असिंचित दशा में 20 अक्टूबर से 10 नवंबर तक कर लेनी चाहिए। इसके लिए उपयुक्त प्रजातियां के 125 (आजाद), के 141, के 560 (हरितिमा), के 226 (लखन) है। जो कि 130 दिन के अंदर तैयार हो जाती है। सिंचित दशा में इसकी बुवाई 25 नवंबर तक कर लेना चाहिए। इसके लिए 409 प्रीति, के 287 जागृति, नरेंद्र जो 2 उपयुक्त प्रजातियां हैं।
बुवाई
बीज की मात्रा 40 किग्रा प्रति एकड़ की दर से प्रयोग करनी चाहिए।
उर्वरक
डीएपी 26 किलो, यूरिया 10 किलो तथा पोटाश 13 किलो प्रति एकड़ की दर से बुवाई के लिए के समय सिंचित दशा में देना चाहिए। श्री सिंह का कहना है कि प्रथम सिंचाई के बाद 13 किलो यूरिया प्रति एकड़ की दर से टॉप ड्रेसिंग किया जाना चाहिए। पहली सिंचाई 30 से 35 दिन पर तथा दूसरी दुग्धावस्था पर करनी चाहिए।

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