खास-मेहमान

लद्यु कथा, शब्द मसीहा : अदर कास्ट

मदुराई के एक मित्र से बहुत समय से मिलने का मन था . वह रेलवे में चतुर्थ श्रेणी में काम करते हैं . मैं उनका गाँव देखना चाहता था . जब मैं वहाँ पहुंचा तो मेरे मित्र मुझे साइकिल पर लेने आये . मुख्य सड़क से हिचकोले खाते हुए गाँव की तरफ मुड़े तो सड़क कच्ची थी . कुछ दूर चलने के बाद वह बोला –

“सर जी ! अब मुझे उतरना होगा साइकिल से .”

मैं पीछे उतर गया और वह भी पैदल चलने लगा . कुछ दूर जाने पर उसने अपनी चप्पलें हाथ में ले ली और मैं उसके पीछे चलता रहा . कई आँखें मुझे घूर रही थीं . मुझसे रहा न गया . मैंने पूछा-

“भाई ! आप पहले साइकिल से उतरे तो मुझे लगा कि सड़क खराब है लेकिन ये चप्पल उतारकर पैदल चलना कुछ समझ नहीं आया ?”

“सर जी ! हम लोग तो अदर कास्ट के हैं . इधर बीच में बड़े लोग के घर हैं . हमको चप्पल पहनकर जाना मना है . चप्पल पहनकर अगर गये तो बड़े लोग झगड़ा करते हैं . बाप-दादा के जमाने से ऐसा ही है .”

“अच्छा ! यहाँ पर भारत का संविधान लागू नहीं होता क्या ?” मैंने पूछा .

“सर ! आप दिल्ली में रहते हैं . ऐसा बोल सकते हैं . हमको तो यहीं रहना है . न पुलिस मदद करती है और न सरकार . कुछ बोलो तो पिटो. अपने लोग भी साथ नहीं देते . जमीन बड़े लोगों के पास हैं . उनकी खेती पर सब लोग पलते हैं . भगवान ने जो कहा है मानना पडेगा .” वह बोला .

“भगवान उनको कभी कुछ नहीं बोलता क्या ? क्या इंसानियत का ठेका तुम अदर कास्ट वालों ने ले रखा है ?” मैंने कहा .

वह नजर नीची किये मौन हो गया .

शब्द मसीहा

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