मैं मां हूँ, मेरा गर्भ, कोई बोझ नहीं…

मेरी कलम से…
आनन्द कुमार

हां मैं मजदूरनी हूं,
रोज ढोती हूँ बोझ,
अपनी जिन्दगी की,
कभी खांची से,
कभी सिर पर, ईंट रख,
इनकी उनकी,
इमारत बनाती हूँ मैं।
पांव भारी है मेरा,
गर्भ में है मासूम,
फिर भी रोज, सूर्य के,
नये अंकुर के साथ,
सांझ होने तक,
रोटी की जुगाड़ में,
हांफती-कांपती हूँ मैं।
फिर भी कभी,
लड़खड़ाने नहीं देती,
अपने पांव,
नहीं तो मेरा बच्चा,
जाग जाएगा,
और कह बैठेगा,
मां यह क्या कर रही,
मेरे लिए तू इतनी,
सितम सह रही हो।
पर कैसे कह दूं,
यह सच है?
मैं मां हूँ, मेरा गर्भ,
कोई बोझ नहीं,
मेरी कोख,
मेरी आँखों का तारा है,
वह मेरा राज दुलारा है।।

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