किसानों के हित के लिये कृषि क्षेत्र में नीतिगत सुधार

वर्ष 1991 में किये गये प्रमुख नीतिगत सुधारों में कृषि को अनदेखा किया गया जिसके कारण 1990-1991 के साथ-साथ 12 वर्षों में पांच वर्षों में कृषिगत आय में नकारात्मक वृद्धि में साथ कृषिगत विकास पूर्व के स्तर पर ही रूका रहा। परिणाम स्वरूप किसानों की कृषि आय और गैर, कृषिगत कार्यकर्ताओं की आय में अंतर लगातार बढता गया। साथ ही भारतीय कृषि की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को और बेहतर बनाने की अति आवश्यकता है। मांग और आपूर्ति को देखते हुये भारत को आने वाले वर्षों में 20-25 प्रतिशत वृद्धिशील कृषि खाद्य उपज को विदेशी बाजार में बेचने की जरूरत होगी। उत्पादों की प्रतिस्पर्धा बढाने के लिए मार्केटिगं और लॉजिस्टक लागत को कम से कम आधा करने की आवश्यकता है। पुराने कार्यो और कानून में जिसकी सम्भावना बहुत कम है क्योकि इसमे बिचैलियों, लघु मंडा लाट और उच्च लेन-देन लगातों की एक लम्बी कड़ी शामिल है। केन्द्र सरकार द्वारा अधिनियमित किया गया है जो है कृषक उपच व्यापार और वाणिज्य अधिनियम 2020, कृषक, सशक्तिकरण और संरक्षणद्ध कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार अधिनियम 2020 इसके साथ ही कृषि खाद्य पदार्थों के लिये आवश्यक वस्तु अधिनियम 1951 में संशोधन किया है।

डा0 रेनू

कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य अधिनियम, एफपीटीसी अधिनियम, 2020 किसानों को अपनी उपज को सीधे खेत से अथवा कहीं से भी फिजिकल मंडी अथवा या इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफार्म के माध्यम से एपीएमसी मंडी में अथवा उसके बाहर निजी माध्यमों, इंटीग्रेटरों, एफपीओ अथवा सहकारी संस्थाओं को बेचने का विकल्प प्रदान करता है। इसमें एमएसपी से छेड़छाड़ करने अथवा उसके महत्त्व को कम करने की कोई मंशा या प्रावधान नहीं है और यह एपीएमसी मंडियों के लिए कोई खतरा पैदा नहीं करता है। एपीएमसी मंडियों और उनके व्यवसाय को वास्तव में खतरा उन अत्यधिक और अन्यायोचित प्रभारों से है, जो इन मंडियों में राज्यों द्वारा वसूले जाते हैं।नया एफपीटीसी अधिनियम केवल इस बात पर जोर देता है कि एपीएमसी मंडियां प्रतिस्पर्धी बने। मंडी अधिकारियों से चर्चा करने के बाद पता चला कि आढ़तियों के कमीशन और मंडी शुल्क सहित अधिकतम 1.5 प्रतिशत का कुल प्रभार मंडियों के प्रचालन और उनके रखरखाव के लिए पर्याप्त है। जो प्रदेश सरकार मंडियों में शुल्क को मंडी सुविधा तक सीमित रखेंगेए वहां की एपीएमसी को नये कानून से कोई खतरा नहीं होगा।

कृषक, (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार अधिनियम, पीएएफएस अधिनियम 2020 में किसी भी किसान के लिए इस करार को करना अपेक्षित नहीं हैय यह निर्णय पूरी तरह से किसान पर ही छोड़ दिया गया है। इस अधिनियम के अंतर्गत कृषि करार में किसान की भूमि अथवा परिसर के हस्तांतरण, बिक्री, लीज, मोर्टगेज पर प्रतिबंध है। इस अधिनियम से संबंधित सभी आशंकाएं कार्पोरेट खेती से संबंधित हैंए जोकि पूर्णतरू अलग व्यवस्था हैं और भारत के किसी भी राज्य में इसकी अनुमति नहीं है। पीएएफएस अधिनियम का झुकाव किसानों की तरफ है। यह कृषि क्षेत्र में नई पूंजी और नवीन ज्ञान को लाएगा और वैल्यू चेन में किसानों की भागीदारी के लिए मार्ग प्रशस्त करेगा। इन दोनों अधिनियमों में यदि आवश्यकता होए तो बदलाव के लिए प्रावधान रखा गया है।
तीसरे अधिनियम में कृषि खाद्य वस्तुओं के समूह के लिए आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन करना शामिल है। इस संशोधन में अधिनियम का संदर्भ देते हुए नौकरशाहों द्वारा मनमाना निर्णय लिए जाने पर छोड़ने की बजाय ईसीए को कार्यान्वित करने के लिए ष्मूल्य ट्रिगरष् के रूप में पारदर्शी मानदंड को विनिर्दिष्ट किया है। ईसीए को कार्यान्वित करने की सरकार की पावर को बनाए रखा गया हैए जैसे कि ईसीए में संशोधन के बाद प्याज की भंडार सीमा नियत करते समय देखा गया है। इसमें संशोधनए कृषि में आदान से लेकर फसल कटाई उपरांत कार्यकलापों के लिए बेहद जरूरी निजी निवेश को आकर्षित करेगा।
इन अधिनियमों के माध्यम से बदलते समयए कृषकों और कृषि की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए ये तीन नीतिगत सुधार किए गए हैं जो कि भारतीय कृषि को नई ऊंचाइयों पर ले जाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बदलाव की क्षमता रखते हैं । इन सुधारों ने भारत के लिए कृषि में एक वैश्विक शक्ति बनने और वैश्विक खाद्य आपूर्ति के लिए पावर हाउस बनने की भावना जाग्रत की है। ये सुधार किसानों की समृद्धिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बदलाव और कृषि को भारतीय अर्थव्यवस्था का ग्रोथ इंजन बनाने के जनक हैं।

लेखिका डा0 रेनू, एन.बी.ए.आई.एम. कुशमौर,
मऊ मेेंं प्रधान वैज्ञानिक

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