कल्पनाथ राय : चिठ्ठी ना कोई संदेश, जाने वो कौन सा देश, कहां तुम चले गए
● काश लौट आते कल्पनाथ, एक बार फिर सूख चुकी मऊ के विकास की गंगा बहने लगती
(आनन्द कुमार)
मऊ। चिट्ठी न कोई संदेश, जाने वो कौन सा देश, कहां तुम चले गए, चिट्ठी न कोई संदेश, जाने वह कौन सा देश, कहां तुम चले गए। बिल्कुल मेरे जनपद का वह बेताज बादशाह, विकास की लौ जलाने वाला वह शख्स ना जाने कहां मऊ की सड़क से लेकर संसद की गलियों से अपना हाथ छुड़ाकर चला गया। आज वह मऊ की सरजमी से लेकर संसद के सदन में रहता तो उसकी बेबाक बोल भारतीय राजनीति में एक अलग ही अंदाज और एक अलग ही महत्व रखते। आज राजनीति की थोड़ी पराकाष्ठा बदली हुई है लेकिन वह शख्सियत वर्तमान में रहता तो उसके नाम राजनीति में बुलंदियों पर होते। वह होता तो मात्र घोसी का सांसद, लेकिन उसकी सोच उसके इरादे पूरे भारत में कुछ अलग ही मायने रखते। आज उस शख्स को मऊ को अलविदा कहे हुए हम तीसरे दशक में प्रवेश कर गए लेकिन लगता है कि अभी अभी तो गया है वह हाथ छुड़ाकर, लौट आएगा किसी भी पल। बहुत याद आते हो कल्पनाथ, बहुत याद आते हो…
मऊ के गौरव पूर्वांचल की पहचान व देश की संसद में घोसी की अलख जगाने वाले विकास पुरुष व जनपद के जनक स्व. कल्पनाथ राय की आज 22वीं पुण्यतिथि है। 04 जनवरी 1941 को मऊ जिले के घोसी थाना अंतर्गत सेमरी जमालपुर गांव में पैदा हुए कल्पनाथ राय ने 58 साल की उम्र में 6 अगस्त 1999 को अपना देह त्याग देश दुनिया को अलविदा कह गये। उनकी मत्वाकांक्षा का ही परिणाम था कि 19 नवम्बर 1989 को मऊ जनपद का सृजन हुआ। 1974 से 3 बार राज्यसभा सांसद और 1989 से 4 बार लोकसभा सांसद और केन्द्र की कांग्रेस सरकार में मंत्री रहते हुए उन्होंने मऊ में विकास की गंगा बहा दी और उनके मृत्यु के बाद मऊ जनपद का विकास पूरी तरह ठप हो गया।
आज स्व. कल्पनाथ राय हमारे बीच में नहीं हैं फिर भी उनकी यादें हर उन आंखों में कैद है जिसने अपने नेता की कार्यशैली को देखा है।
घोसी लोकसभा सहित पड़ोसी जनपदों में खासकर पूर्वांचल में उस दौर के हर एक शख्स के जेहन में पैठ रखने बाले चाहे वह पक्ष का हो या विपक्ष का, कल्पनाथ राय न सिर्फ राजनीति के नामचीन हस्ती थे बल्कि विकास उनका दूसरा नाम था।
आज के दौर में युवाओं की वह पीढ़ी लाखों की तादात में जवान हो गयी जिसने न कल्पनाथ राय को देखा न ही उनकी आवाज सुनी । वे स्व. राय के द्वारा विकास की खड़ी की गयी इमारतों को देखकर अपनों से उस शिल्पी का नाम सुनकर विकास पुरुष को जानने व समझने की कोशिश करते है।
आज पूरा जनपद और पूरा पूर्वांचल उन्हें नमन् कर रहा है।
मऊ की जनता को अलविदा कहे हुए स्व. कल्पनाथ राय को दो दशक पूरा हो गया और तीसरे दशक में यादें दस्तक दे दी। आज मऊ का जननायक हमारे बीच में नहीं है पर जर्रे जर्रे से उसके कार्यों, विकास की गाथाओ की आवाज आ रही है। आज जनता हर जनप्रतिनिधि में स्व. कल्पनाथ राय के अंश को ढूंढ रही है।काश एक बार फिर दूसरा कल्पनाथ राय इस धरती पर जन्म ले और एक बार फिर सूख चुकी विकास की गंगा यहाँ बहने लगे।


