अमर्त्यसेन की दृष्टि से देखें राहुल को

(यशोदा श्रीवास्तव)

आजकल राहुल गांधी फिर चर्चा में हैं। हर बार की तरह इस बार भी उनकी चर्चा तल्ख नकारात्मक रूप में ही है। राहुल गांधी के इस बार की चर्चा दो मुख्य वजहों को लेकर है।पहला बिहार का चुनाव परिणाम और दूसरा अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा की पुस्तक ए प्रामिस्ड लैंड! बिहार चुनाव में कांग्रेस की सीटें निराश करने वाली रही जबकि ओबामा ने अपनी पुस्तक में राहुल गांधी को नर्वस नेता की उपाधि से नवाजा है।

यहां हम कांग्रेस की बात कम राहुल गांधी पर ज्यादा करना चाहेंगे। ये अलग बात है कि जब हम राहुल पर कुछ कहें तो लोग उसे कांग्रेस की ओर मोड़ना चाहेंगें। बात ओबामा के पुस्तक में राहुल के जिक्र से शुरू करते हैं। ओबामा की राहुल के प्रति जो नजरिया है वह करीब दस साल या उससे अधिक पहले का है जब वे अमेरिकी राष्ट्रपति के तौर पर दिल्ली आए होंगे और इसी दौरान उनकी कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात हुई होगी।पुस्तक में ओबामा ने सोनिया गांधी के साथ खाने की मेज पर बातचीत के दौरान राहुल को,जहां वे भी मौजूद थे,रीड कर अपना विचार व्यक्त किया है। हालांकि उन्होंने राहुल के भीतर तमाम संभावनाओं को भी स्वीकारा है।

हैरत है कि अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति ओबामा की पुस्तक में राहुल विरोधियों ने केवल वही अंश ग्रहण किया जो उनके मनमाफिक था। यानिकि राहुल एक नर्वस करने वाले नेता हैं? सोशल मीडिया के जरिए इस एक वाक्य को इसलिए खूब प्रचारित किया गया ताकि राहुल की केंद्र की भाजपा सरकार के प्रति उभर रही आक्रमक छवि को उभरने से रोका जा सके। ओबामा की पुस्तक के बहाने राहुल की छवि बिगाड़ने की रेस में एक से एक नामचीन पत्रकारों और पूर्व संपादको की भीड़ हैं।ये वे लोग भी हैं जो स्वयं को भारत का सच्चा सपूत भी कहते हैं। इनकी राष्ट्र भक्ति तब और निखर उठती है जब इनके नापसंद वाले किसी भारतीय नेता के खिलाफ कोई टिप्पणी विदेश से आ रही होती है। ओबामा की राहुल पर की गई टिप्पणी राहुल विरोधियों के लिए बड़ी खुराक है।
राहुल गांधी वेशक सत्ता से बहुत दूर हैं, सत्ता रूढ़ दल उन्हें अपने नजदीक कभी आ पाने की कल्पना भी शायद न करता हो लेकिन राहुल गांधी पूर्व प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी के पुत्र और पूर्व प्रधानमंत्री स्व.इंदरा गांधी के पोते के रूप में भारतीय राजनीति का बड़ा चेहरा हैं ही,भारत के सबसे पुरानी राजनीतिक दल जिसके की भले 50–54 सांसद हों,इसके नेता के रूप में उनकी अहमियत को नकारा नहीं जा सकता। राहुल की अहमियत तब और बढ़ जाती है जब किसी बेतुके मुद्दे को लेकर सत्ता पक्ष उनपर हमलावर हो जाता है।

ओबामा की पुस्तक जिसमें उन्होंने अपने वर्षों पुराने नजरिए का जिक्र किया है, उसे हाथो हाथ लेने वाले राहुल विरोधियों को भारत के ख्याति प्राप्त अर्थशास्त्री अर्मत्यसेन की पुस्तक को भी पढ़ लेना चाहिए जिसमें उन्होंने राहुल गांधी को भारत के गली कूचे से लेकर गांव गिरांव बस्ती बस्ती की समझ रखने वाला नेता बताया गया है। चूंकि ये नव राष्ट्र भक्त हैं इसलिए इन्हें भारतीय लेखक की लिखी बात झूठी लग सकती है। अर्मत्यसेन की यह पुस्तक ओबामा के पुस्तक के बहुत बाद लिखी गई। मुमकिन है कि ओबामा ने जब राहुल को देखा होगा तब वे राजनीतिक रूप से मेच्योर न रहे हों जिसका कि उन्होंने अपनी पुस्तक में जिक्र किया है। लेकिन क्या ओबामा के पुस्तक का वह अंश अभी भी सच के करीब है? यह सच नहीं है लेकिन भारत के राहुल विरोधियों को अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा की पुस्तक ज्यादे विश्वसनीय लगती है क्योंकि उसमें राहुल एक नर्वस नेता बताए गए हैं।

अब बिहार के चुनाव परिणाम पर बात करें। इसमें कोई शक नहीं कि बिहार का चुनाव परिणाम कांग्रेस की उम्मीदों से दूर रहा। अब इसे लेकर भी राहुल पर व्यंग्य बाण जारी है।कोई कह रहा है कि 70 सीटें कांग्रेस को देना भारी भूल थी कोई कह रहा है कि राहुल ने 70 सभाएं तक नहीं की। सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस अपनी पहचान खुदको गठबंधन वाली पार्टी के रूप में बना ले? याद रखना होगा बिहार में चार सीटें हासिल करने पर भी कांग्रेस ने अपना हौसला डगमग नहीं होने दिया। अब कांग्रेस जिन 70 सीटों पर लड़ी थी उसकी सच्चाई यह है की इनमें से 43 ऐसी सीटें थी जहां पिछले चार चुनाव से कांग्रेस जीती ही नहीं थी और आरजेडी का प्रदर्शन भी यहां खराब रहता था। इसके अलावा इनमें 42 सीटें ऐसी थी जिन पर 2019 के लोकसभा चुनाव में एनडीए की भारी बढ़त थी। यानि कि ले देकर कर ये 43 सीट कांग्रेस के लिए बहुत मुश्किल भरे थे। ऐसे में कांग्रेस अपनी जीती हुई 27 सीटों पर ही लड़ी थी जिसमें उसे 19 पर जीत मिली और कुछ पर हराए जाने के आरोप लग रहे हैं। अब आरजेडी के नेता शिवानंद तिवारी का वह बयान कितना समीचीन है कि कांग्रेस के नाते राजद का खेल बिगड़ा। इसके इतर पत्रकार रहे आरजेडी के एक प्रवक्ता ने साफ कहा कि बिहार के चुनाव परिणाम के लिए राहुल जिम्मेदार नहीं हैं क्योंकि महागठबंधन को सत्ता से दूर रखने की गहरी साजिश थी। चुनाव परिणाम हतप्रभ करने वाला है, यह सभी मान रहे लेकिन सातवीं बार सीएम की कुर्सी संभाले नीतीश अब भी यदि भयभीत हैं तो महागठबंधन से ही। कहना न होगा कि मीडिया का एक बड़ा वर्ग राजद और कांग्रेस में दूरी बढ़ाने के षणयंत्र में जुट गया है। कांग्रेस राजद से अलग हुई तो राजद कमजोर होगी। हालांकि तेजस्वी यादव ऐसा कभी नहीं होने देंगे और न ही चाहेंगे क्योंकि चुनाव परिणाम की सच्चाई वे जानते हैं। हैरान हूं कि यह सच्चाई शिवानंद तिवारी जैसे लोग जानकर अनजान क्यों बन रहे हैं? राजद के शिवानंद तिवारी ही क्यों?कांग्रेस के चिट्ठी गैंग के प्रमुख सदस्य कपिल सिब्बल कहां कम हैं? बिहार चुनाव परिणाम के बाद एक अंग्रेजी अखबार में दिया गया इंटरव्यू राहुल के प्रति सिब्बल का नजरिया ही दर्शाता है।

जाने अनजाने शिवानंद तिवारी और सिब्बल ऐसे ही षणयंत्र को मजबूती प्रदान कर रहे हैं।2015 में 27 सीटों के साथ कांग्रेस आरजेडी के साथ नीतीश सरकार का हिस्सा थी।कुछ महीने बाद ही नीतीश बीजेपी से जा मिले और एनडीए का हिस्सा बन गए। इस हालात के लिए क्या राहुल जिम्मेदार थे? राहुल पर उंगली उठाने वाले समीक्षक और शिवानंद तिवारी जैसे लोग तब इस स्थिति के पैदा होने के लिए किसी जिम्मेदार पर अपना मुंह क्यों नहीं खोले?

भारत की मौजूदा राजनीति में राहुल का हाल अभिमन्यु की तरह है जो अपने दल के भीतर से लेकर सत्ता पक्ष के एक से एक तीरंदाजों से घिरे हुए हैं। हाल के वर्षों में चुनावी दृष्टि से कांग्रेस जब जब कमजोर हुई है, तो अकेले राहुल को अपनों के साथ विपक्ष के आलोचना का शिकार होना पड़ा।पार्टी में अभी भी उबारने वालों की संख्या के मुकाबले उपहास उड़ाने वाले अधिक हैं।

शिद्दत से कहना चाहूंगा कि स्व.इंदरा जी और राजीव के करीबी होने के नाम पर तमाम ऐसे उच्चपदस्थ लोग हैं जो कांग्रेस में सिजनल बयान बाजी करते रहते हैं। ऐसे लोगों को मैने कभी एमपी के पूर्व सीएम कमलनाथ और मणिशंकर अय्यर के बेहूदे बयानों पर अफसोस जताते नहीं देखा। एमपी के 28 सीटों पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस महज नौ सीटें ही जीत सकी।इसके लिए भी राहुल जिम्मेदार? क्यों नहीं बीच चुनाव में बीजेपी उम्मीदवार इमरती देवी पर दिए गए उस बयान को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है जिसमें कमलनाथ ने उस महिला उम्मीदवार को आइटम जैसे घटिया शब्दों से नवाजा था।माना कि इमरती देवी चुनाव हार गईं लेकिन इस एक शब्द से कांग्रेस को कितनी सीटों का नुकसान हुआ,इस पर चर्चा क्यों नहीं होनी चाहिए?

बिहार के चुनाव परिणाम पर राहुल को बतौर कांग्रेस नेता के नाते जिम्मेदार ठहराने वाले आखिर बिहार के चुनाव प्रभारी कटिहार से कई बार सांसद रहे तारिक अनवर पर सवाल नहीं उठाते।शत्रुघ्न सिन्हा जो अपने पुत्र को भी चुनाव जितवाने में विफल रहे,उनसे नहीं पूछा जाता कि अरे भाई कहां गुम हो गई आपकी लोकप्रियता? बिहार से कांग्रेस का पराभव शुरू होने के बाद पटना का सदाकत आश्रम तंबाकू ठोक काग्रेसियों का अड्डा बनकर रह गया जहां से हरबार कांग्रेस का परचम फहराने का दावा किया जाता रहा,कांग्रेस का चिट्ठी गैंग इन गैर जिम्मेदारों पर उंगुली नहीं उठाता। अफसोस कि पार्टी में ऐसे तमाम लोग अभी भी हैं जिनकी भी जिम्मेदारी है कांग्रेस को उबारने की। लेकिन नहीं, ये लोग हर बारके चुनाव में कांग्रेस के चमत्कार की उम्मीद करते हैं वह भी तब जब कांग्रेस पहले की तरह विभिन्न जातियों में पैठ रखने वाली पार्टी नहीं रह गई। बावजूद इसके यदि अब भी कांग्रेस करीब 12 करोड़ वोटरों की पसंद है तो निस्संदेह इसलिए कि यह नेहरू गांधी परिवार की कांग्रेस है। आखिर राहुल गांधी भी इसी कांग्रेस के उत्तराधिकारी हैं।

बताने की जरूरत नहीं कि आज जिस राहुल गांधी को कमजोर करने की कोशिश चल रही है, पार्टी के भीतर भी और बाहर भी,वह राहुल इतना कमजोर न कभी होगा न है। वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री कहते हैं कि राजनीति में पदार्पण के बाद राहुल गांधी ने 250 से ज्यादा पत्रकार वार्ताएं की है।पत्रकारों के हर सवाल का जवाब उन्होंने बिना कोई कागज पढ़े बहुत ही तमीज से दिया है। सच यह है कि राहुल को कमतर आकने वाले उनके निंदक या आलोचक कभी तो इस बात को मानेंगे कि कोरोना से लेकर नोटबंदी, देशबंदी,क्रूरतम जीएसटी से उत्पन्न विकटतम आर्थिक परिस्थितियों से देश को यदि किसी ने अगाह किया तो वे राहुल गांधी ही थे। चीन का नाम लेने से घबड़ा रहे हुक्मरानों को सोचना पड़ेगा कि चीन के मसले पर खुलकर किसी ने कुछ बोला तो राहुल गांधी बोले। राहुल गांधी की प्रासंगिकता इस बात से पता चलती है कि वे जबभी केंद्र सरकार पर आक्रमक होते हैं तो केंद्र सरकार के दर्जन भर मंत्री उसका काउंटर करने उतर पड़ते हैं। इस सबके बीच राहुल गांधी की दो कमियां भी देखी गई जिसकी आलोचना भी जरूरी था जो बिना किसी रहम के हुआ भी। पहली कमी थी एक पत्रकार वार्ता के दौरान यूपीए के ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का एक विल फाड़ना दूसरी थी संसद में अपने मित्र सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया से आंख दबाकर बात करना। राहुल के इन दोनों ही कमियों को परिस्थिति जन्य की दृष्टि से देखा जाना चाहिए न कि परंपरागत। राहुल गांधी 2019 के लोकसभा चुनाव हारने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष पद त्याग चुके हैं। वे दुबारा बनना भी नहीं चाहते लेकिन यदि नहीं बने तो यही राहुल विरोधियों की जीत है। राहुल पर वंशवाद का आरोप भी लग रहा है।यह न केवल औचित्य हीन है, समझ से भी परे है। किस दल में वंशवाद नहीं है? गणीतिय दृष्टि से देखें तो कांग्रेस बहुत पीछे है। लेकिन वंशवाद की बात पर निशाने पर राहुल गांधी रहते हैं। बहुत अच्छा लगता है जब विपक्ष कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में नेहरू गांधी परिवार से इतर किसी व्यक्ति की वकालत करता हुआ दिखता है लेकिन इसके पीछे उसकी मंशा कांग्रेस के विनाश की होती है।उसे पता है कि जब जब कांग्रेस का नेतृत्व इस परिवार के इतर रहा,कांग्रेस कमजोर ही हुई। उसे यह भी पता कि जब जब कांग्रेस का बिभाजन हुआ,लोगों ने उसी कांग्रेस को स्वीकार किया जिसका नेतृत्व नेहरू गांधी परिवार के हाथ में रहा। बिहार चुनाव समेत अन्य प्रदेशों के चुनाव परिणाम पर विरोधियों के शब्द बाण की परवाह किए बिना राहुल को अध्यक्ष पद स्वीकार करने का मैं पक्षधर हूं।इधर जब चुनाव परिणाम को लेकर ईवीएम पर शक है तो क्यों न यह माना जाय कि जब जब राहुल एक मजबूत नेता के रूप में उभर रहे होते हैं तब तब उस वक्त हो रहे चुनावों में इवीएम के जरिए उन्हें अपरिपक्व व कमजोर साबित करने की कोशिश की गई हो?

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