शब्द मसीहा : तरक्की और त्यौहार
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गाँव में एक अजीब सा माहौल बन गया था . एक हफ्ते पहले आलोक लौटा था विदेश से . पैदा तो गाँव में ही हुआ था मगर पढ़ा शहर में फिर विदेश चला गया था . होली मनाने आया था . हर छोटे-बड़े से दुआ सलाम उसका काम था जैसे .
“सोना चाचा ! जय राम जी की .” उसने अपने घर की चौपाल से पुकारा .
“जय जय राम जी की भैया ! कैसे हो ? कल होली है . खूब मौज करनी है हमें , सो बाजार जा रहे हैं .” वह साइकिल पर लटका थैला दिखाते हुए बोला .
“क्या लाओगे बाजार से ?” आलोक ने पूछा .
“अरे! भैया …सालभर का त्यौहार है. रंग गुलाल. कुछ खाना और आप सब के लिए अंग्रेजी दारू . कल हमारे साथ ही पीना .” सोना बोला .
“हा हा हा …चाचा ! मैं नहीं पीता दारू .” आलोक बोला .
“हाय राम ! अंग्रेज देश में रहकर भी नहीं पीते . कमाल है भाई . कोई साधू बाबा से नामदान लिए हो का ?” सोना ने चौंकते हुए कहा.
“नहीं , पर मैं जानता हूँ कि दारू हमारे समाज के लिए अभिशाप है . अब देखो तुम दिनभर मेहनत करके कमाते हो चार-पाँच सौ रुपये और दारु अकेली आएगी तीन चार सौ की . बाकी घर के लोग क्या करेंगे ? तुमसे झगडा करेंगे या फिर तुम से डरकर रहेंगे . दारू का पैसा अगर तुम घर के लिए लगाओगे तो वे सब खुश होंगे और दारू पीकर अकेले तुम और तुम्हारे दोस्त . पैसा होगा तो बच्चो की पढ़ाई अच्छी होगी, बच्चे पढेंगे तो तुम्हें सम्मान मिलेगा . घर में खुश रहेंगे तो हर रोज होली और दिवाली होगी . अब तुम हो बताओ की नशा बड़ा या ख़ुशी ?”
सोना स्तब्ध था इस तरह समझाने पर .
“आलोक बेटा ! तुम यहाँ मत बैठो ! चौपाल पे चलकर सब को बताओ ये बात . तुम्हारे घर से लोग चिढ़ते हैं पर किसी को ये नहीं पता कि तुम्हारे बाप ने अलग सोचा तो आज उसकी तरक्की हुई है .” वह आलोक के पैरों में गिर पड़ा .
“अरे! उठो चाचा ! क्या कर रहे हो. अगर हम सब नशा छोड़ दें. आपस में मदद करें तो मैं दावा करता हूँ कि अपना समाज और देश दस ही सालों में उस विदेश से आगे जा सकता है. हर चेहरे की मुस्कान ही रंग गुलाल है और तरक्की ही त्यौहार है .”
शब्द मसीहा

