मेरी उलझी परिस्थिति की, सुलझी मार्ग हो तुम….
( उर्वी बरनवाल )
गम के सागर में , अडिग शिला हो तुम,
मेरी माँ….
बड़ी भोली हो तुम
मन्दिर में स्थित ,
मूर्ति सी स्थिर हो तुम
उगते ढलते आफताब सी
समय निष्ठ हो तुम
जो लफ्ज़ जुबा तक नही आते मेरे
उन्हें भी पहचानती हो तुम
समाज सेवा में लीन
खुद का ख्याल रखना भी भूल जाती हो तुम
किसी से ईर्ष्या नही करती
श्री बाँके बिहारी की दीवानी हो तुम
अपनी तकलीफ को पलको के पीछे छिपाए
मुस्कुरा के जीवन व्यतीत करती हो तुम
सबकी पसन्द नापसन्द का ध्यान रखकर
उनको खुश कर देती हो तुम
अपने इस संघर्षपूर्ण जीवन मे
कितना कष्ट सह लेती हो तुम
इतना सम्मान पाकर भी सबसे
कभी अभिमान करती नही तुम
मेरे लिए अपने सुकून का भी
बलिदान कर देती हो तुम
मेरी उलझी परिस्थिति की
सुलझी मार्ग हो तुम
मेरे जीवन की खूबसूरत
दास्तां हो तुम।।

