बिल्डर को हम ही शहर बेचते हैं, कहने को हम सब ख़बर बेचते हैं
( अनिल भास्कर )
कभी हादसों का क़हर बेचते हैं,
कभी सनसनी का ज़हर बेचते हैं,
कभी आँसू तो कभी डर बेचते हैं,
कहने को हम सब ख़बर बेचते हैं।
दुनिया का बीता पहर बेचते हैं,
काले हरफ़ हर सहर बेचते हैं,
सत्ता के नगमे, सियासी फसाने,
उम्मीदों का झूठा दहर बेचते हैं।
कहने को हम सब खबर बेचते हैं।
‘काफ़िरों’ के ईनामी सर बेचते हैं,
सरफिरों का क़ौमी ग़दर बेचते हैं,
नफरत की आंधी, बलवे के शोले,
फसादों का खूनी मंजर बेचते हैं।
कहने को हम सब ख़बर बेचते हैं।
गुरुओं का दैवीय असर बेचते हैं,
निर्मल कृपा का भँवर बेचते हैं,
डेरा, सत्संग, कथा, भोग, प्रवचन,
बाबा के सारे हुनर बेचते हैं।
कहने को हम सब ख़बर बेचते हैं।
कभी झूठे सपनों का घर बेचते हैं,
आशियाने का हर पत्थर बेचते हैं,
जनहित का शोक मनाने से पहले,
बिल्डर को हम ही शहर बेचते हैं।
कहने को हम सब ख़बर बेचते हैं।

