तजुर्बा-ए-अगुअई (योग्य वर की तलाश) पार्ट-02
( उज्ज्वल )
इस बार लड़के की तलाश में गोह (औरंगाबाद) पंहुचा था। बताया गया था कि लड़का टीसीएस (टाटा कंल्टेंसी सर्विसेज) में एच आर मैनेजर है। एमबीए किया हुआ है। इधर लड़की भी बीटेक करने के बाद बेंगलुरु में जॉब कर रही थी। अपने दो भाइयों की इकलौती बिटिया को पढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई थी। इसलिए उसकी पसंद के हिसाब से वर की तलाश की जा रही थी।
हमलोग भी चार-पांच लोगों के साथ पंहुचे थे। दिखावे में अपनी ओर से भी कोई कमी नहीं थी। टाटा की सफारी कार से बिचवान (mediater) को लेकर गए थे। बिचवान पास के गांव के किसान थे। बाद में मुझे वे एजेंट ही मालूम पड़े। खूब जमकर खातिरदारी हुई। लड़के के पिता सेवा निवृत्त शिक्षक थे। गोह बाजार में ही घर था। संकरी सीढ़ी से होते हुए उनके छोटे से कमरे में दाखिल हुए। चमचम मिठाई के साथ हल्दीराम वाला भुजिया और कुछ फल भी था। नाश्ता होने के बाद पिता ने बड़े गर्व से बेटे को बुलाया। बेटे ने खुद को टाटा स्टील जमशेदपुर में एचआर मैनेजर बताते हुए अपना विजिटिंग कार्ड हमलोग की तरफ बढ़ा दिया। इसके पहले लड़की का बॉयोडाटा और फ़ोटो हमलोग भी उनके पिता को दे चुके थे। तुरत पंसन्दगी का जवाब मिल चुका था। लड़के के पिता इस मौके को हर हाल में भुना लेना चाहते थे। पगड़ी बांध कर बीच में बैठे थे। हमलोगों ने पूछा-आगे कैसे बात बनेगी। झट से जवाब दिया-30 लाख तक तो खर्च हो ही जायेगा। बेटे की शादी की निशानी के तौर पर एक कार दे देंगे तब बढिया रहेगा। लड़की वाले तो इतने पर भी तैयार थे। मैंने कहा-थोड़ा रुक जाइये। लड़के के जॉब के बारे में भी पता कर लेना चाहिए। जमशेदपुर में दैनिक भास्कर में नौकरी की थी। कुछ कॉन्टैक्ट हो गए थे। लड़के के पिता को अगले एक वीक में आने की बात कह कर वहां से चल दिये। अब कार में बैठे-बैठे ही लड़के की नौकरी के बारे में पता करना शुरू किया। इसका डिटेल अपने एक मित्र को भेजा, जो टाटा कंपनी की रिपोर्टिंग करते थे। अगले दिन उन्होंने लड़के के बारे में बताया कि इस नाम का यहां कोई एचआर मैनेजर नहीं है। मैंने थोड़ी और पड़ताल करने का आग्रह किया। यह पता करने की कोशिश की कि वास्तव में यह लड़का किस रूप में टाटा से जुड़ा है। दो दिन बाद पता चला कि टाटा ने कुछ काम आउट सोर्स कर रखा था। उसमें यह एक्सक्यूटिव के तौर पर काम कर रहा था। इसके साथ ही एक ठग से बच गया और अगली बार गोह जाने का प्रोग्राम कैंसिल कर दिया गया।
लड़का बीपीएससी से चयनित होकर लेबर अफसर बना था। टेहटा से कोई 8-9 किलोमीटर पश्चिम गांव पड़ता है। लड़की स्नातक की हुई थी। इस बार उसी गाँव के एक सज्जन के साथ जाना था। पहले उन्हीं के यहां पंहुचे। उन्होंने उसके परिवार की स्थिति से अवगत कराया और चाय पिलाने के बाद उसके दरवाजे पर पंहुचे। कुल मिलाकर चार-पांच लोग थे। दरवाजे पर दो-तीन कुर्सियां लगी थीं। दो लोग कुर्सी पर और शेष चौकी पर बैठे। स्टील के बड़े से ग्लास में अभी पानी आया था। अभी हमलोगों की बात शुरू ही हो रही थी। इसी बीच लड़के के पिता ने कहा कि 45 लाख नगद और एक कार देना हो तब आगे की बात की जाएगी। इस घर में यह पहली नौकरी थी। गोइठा के चूल्हे पर ही खाना बन रहा था। हैंडपंप का पानी ही पीने में इस्तेमाल हो रहा था। लड़की का जीवन स्तर इससे कहीं बेहतर था। कहा जाता है कि लड़की को उससे श्रेष्ठ परिवार चाहिए। यहां सब उल्टा था। चाय भी उसी स्टील के गिलास में मिला था, जिसमें पानी मिला था। ठंड से बचने के लिए घर के आगे बोरसी रखा था। ऐसे परिवार ने भी 45 लाख की रकम की मांग निःसंकोच कर डाली। तर्क भी दिया कि 25 लाख तो सिपाही और फौज का जवान ले रहा है। मैंने तो उस हिसाब से कम ही कहा है। इसके बाद तो वहां से चल देने में ही हमलोगों ने अपना भला समझा। शुद्ध किसान पिता कैसे बिना किसी लाग लपेट के इस तरह बातें कर सकता है। हमलोगों के साथ रहे उसी गांव के ग्रामीण ने कहा कि यदि यह अपनी सारी सम्पत्ति को बेच भी दे तो मुश्किल से 20-25 लाख भी नहीं मिल पायेगा। अस्तबल जैसे घर को यदि वह ठीक करना चाहे तब आधी सम्पत्ति बेचनी पड़ेगी।
क्रमशः ….
