खास-मेहमान

ग्रेसी जान ने 22 साल के सफर में काफी दुश्वारियां झेल पायी मुकाम

(अशोक जायसवाल)

बिल्थरारोड/बलिया। “नए चिराग जलाने की कोशिश में रहे, मजे की बात खुद ही बारिशों में रहे”, इरादे अगर नेक हों तो अपने संघर्ष से निश्चित रूप से किसी कार्य के बीच आने वाली बाधाओं को मनुष्य आसानी से पार कर एक नया मुकाम हासिल कर लेता है। कुछ ऐसी ही कहानी है केरल से नन बनने के लिए वाराणसी शिक्षा प्राप्त करने आई एक महिला ग्रेसी जान की। नवजीवन इंग्लिश स्कूल की प्रबंध निदेशक ग्रेसी जान आज किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। परंतु अतीत में झांका जाए तो इस मुकाम पर पहुंचने के लिए इस महिला ने एक लंबे संघर्ष का रास्ता तय किया है। सन 1996 में केरल राज्य की एक गांव पलवल से 19 वर्ष की अवस्था में नन की पढ़ाई करने आई एक युवती ग्रेसी जान को जब 1997 में बिल्थरारोड में स्थित एक अंग्रेजी माध्यम से चलने वाले विद्यालय में अध्यापन कार्य करने का अवसर मिला। तो वह यहां एक शिक्षिका के रूप में नौकरी करने पहुंची।

उसकी योग्यता को देखते हुए विद्यालय के प्रबंधक ने उसे वहां का प्रधानाचार्य बना दिया परंतु ग्रेसी जान को वहां का माहौल नहीं भाया। उसने छः माह के पश्चात ही स्कूल से त्यागपत्र देकर एक किराए के मकान में नवजीवन इंग्लिश स्कूल के नाम से खुद का विद्यालय खोल दिया। जब उसका स्कूल विकास की ओर अग्रसर होना शुरू हुआ ही था कि तभी मकान मालिक के कुछ मुद्दों पर सहमति ना होने से उसको वह स्थान छोड़ना पड़ा। मकान छोड़ने के पश्चात उसने एक नए किराए का मकान लेकर पुनः अपना विद्यालय शुरू कर दिया। इस दौरान समाज में एक अकेली लड़की के रहने पर उसके साथ आने वाली सारी दिक्कतों का भी इस महिला ने डंटकर सामना किया। किराए के मकान में चल रहे ग्रेसी जान के विद्यालय की तरक्की को देखते हुए मकान मालिक ने दो साल बाद उससे लफड़ा कर मकान खाली करने को कहा। मजबूर ग्रेसी को वह मकान छोड़ना पड़ा इस बीच बिठुवां में उसने 40 हजार के बयाने पर 15 डिसमिल जमीन खरीद लिया। वहीं पर उसने अपने स्कूल के बच्चों को टाट आदि बिछाकर शिक्षा देना शुरू किया। इस बीच उसने इसे विद्यालय का रूप देना शुरु कर दिया। मजदूरों के साथ ग्रेसी भी रात के अंधेरे में अपने सिर पर ईटों का बोझ उठाती रही। धीरे-धीरे समय बीतने के साथ ही टीनशेड में परिवर्तित हुआ विद्यालय आज तीन मंजिला इमारत में तब्दील हो चुका है। विद्यालय के इस विस्तार में जमीन संबंधी विवाद को लेकर ग्रेसी जान का सामना तत्कालीन बसपा के क्षेत्रीय विधायक से भी हुआ। परंतु उसने हार नहीं मानी तथा अपने संघर्षों के बल पर उन्हें समझौते के लिए मजबूर कर दिया। 30 बच्चों से शुरू हुआ नवजीवन इंग्लिश स्कूल में आज 2000 से अधिक छात्र/छात्रायें अपने भविष्य को संवारने में लगे हैं। खुद नौकरी करने आई ग्रेसी आज अपने संघर्षों के बल पर दूसरों की रोजी रोटी को देने में सक्षम हो चुकी है। स्वयं समूह द्वारा यह महिला समाज सेवा व महिला सशक्तिकरण के कार्यों में भी जुटी हुई है। ग्रेसी जान को शिक्षा के प्रति जागरूकता व कड़ी मेहनत को देखते हुए दिल्ली में शिक्षा भारती पुरस्कार से नवाजा गया। ग्रेसी जान को इसके पश्चात बलिया के तत्कालीन डीएम व एसपी द्वारा भी महिला शक्तिकरण के रूप में सम्मानित किया गया। वह अपनी इस कामयाबी का राज नेक इरादे व सही दिशा में की गई कड़ी मेहनत को मानती हैं। निश्चित रूप से यदि मनुष्य के अंदर संघर्ष का माद्दा हो तो वह किसी भी ऊंचाई अथवा मुकाम को प्राप्त कर सकता है।

अंत में ग्रेसी जान के बारे में दो शब्द बस इतना ही कहना है…

…तुम डिगाओ तो सही हम डिगेंगे नहीं, हमें मंजिल पाना है, हमें बढ़ते जाना है, जुनून ले फौलादी आएं हैं तेरे शहर में, मुझे शिक्षा का अलख जगाना है, हमें बढ़ते जाना है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *