क्या सच में तुम बलात्कारी हो ?
मेरी कलम से…
आनन्द कुमार
भूख मिटाना था तन का तो,
वेश्या के कोठे पर चले जाते,
भोग विलास में डूब वहीं पर,
अपनी मर्यादा तर कर जाते।
काहे किसी बेटी को तुमने,
अपना निवाला बना डाला,
भेड़िये थे अगर मन-मस्तिष्क से,
तो क्यों न खुद को जला डाला।
धिक्कार तुम्हारी राजनीति पर है,
मक्कार तुम्हारी जवानी है,
गद्दार तुम्हारी पृष्ठभूमि की,
पल-पल एक कहानी है।
इंसाफ तुम्हारी करतूतों का,
कोई अदालत क्या देगा,
जनता की अदालत में मिल जाते,
तो फैसला तुम्हारी दिवानी है।
कुलदीप तुम हो नहीं सकते,
कुलदीपक के नरसंहारी हो,
जनप्रतिनिधि गलती से हो गये,
क्या सच में तुम बलात्कारी हो।

