रचनाकार

20 साल की उम्र में मऊ के अरूण ने लिखी दो किताब! “मैं मणिकर्णिका हूं” व “प्रेमावली”

मऊ के युवा ने 20 साल की उम्र में लिख डाली दो किताबें, कभी साइकिल से बेचता था मसाला

@आदर्श सिंह…

मऊ शहर के छोटे से गांव गरथौली का एक युवा, जिसने महज 20 साल की उम्र में अपनी लेखनी से साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बना ली है। अब मऊ शहर के हनुमान नगर के रहने वाले अरुण चौरसिया, जिन्होंने 12वीं के बाद इंजीनियरिंग या सरकारी नौकरी जैसे पारंपरिक रास्तों को छोड़कर साहित्य और पत्रकारिता को चुना, आज अपनी मेहनत और लगन से नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा बन रहे हैं। लखनऊ में पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान उन्होंने अपनी पहली किताब “प्रेमावली” लिखी और अब मास्टर्स के पहले साल में दूसरी किताब पूरी कर चुके हैं। उनकी दूसरी किताब, “मैं मणिकर्णिका हूं”, काशी के मणिकर्णिका घाट पर आधारित है, जिसमें काशी से जुड़े रहस्य, पुनर्जन्म, अघोरी और मृत्यु जैसे गहरे विषयों को छुआ गया है। इसके साथ ही, अरुण ने नेट का एग्जाम पास कर और प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम कर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है।

इंजीनियरिंग छोड़ पत्रकारिता और साहित्य को अपनाया…

अरुण चौरसिया ने कक्षा पांचवीं तक आरएसएस कांवेंट स्कूल अलीनगर, मऊ, कक्षा छ से हाईस्कूल सेंट फ़्रांसिस स्कूल इंदारा मऊ व 12वीं की पढ़ाई अमृत पब्लिक स्कूल नसोपुर मऊ से पूरी की, लेकिन उनका मन इंजीनियरिंग या डॉक्टरी जैसे रास्तों की ओर नहीं गया। उन्होंने ग्रेजुएशन लखनऊ विश्वविद्यालय से तथा वर्तमान में पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएशन बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय लखनऊ से चल रहा है। लखनऊ में बैचलर की पढ़ाई के सेकेंड ईयर में ही उनकी पहली किताब “प्रेमावली” आ गई। उनकी दूसरी किताब, “मैं मणिकर्णिका हूं”, जिसे पूरा करने में तीन साल लगे, जो काशी के मणिकर्णिका घाट की पृष्ठभूमि में लिखी गई है। इस किताब में काशी के रहस्य, पुनर्जन्म की कथाएं और मृत्यु से जुड़े सवालों के जवाब समाहित हैं। अरुण का कहना है कि यह किताब उनके लिए सिर्फ एक रचना नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा है, जिसने उन्हें जीवन और मृत्यु के गहरे अर्थ समझाए। इसे लिखने में बहुत रिसर्च लगी है। ये किताब लोगों को काफी पसंद भी आ रही है।

चुनौतियों से भरा रहा सफर…

अरुण का जीवन हमेशा आसान नहीं रहा। लॉकडाउन के मुश्किल दौर में, जब कई लोग हताश हो गए थे, अरुण मऊ की गलियों में साइकिल पर अपने हाथों से बनाया मसाला बेचा करते थे। एक छोटी सी किराने की दुकान चलाने वाले उनके माता-पिता ने उन्हें पढ़ाई के लिए शहर भेजा।अरुण कहते हैं कि उनकी पढ़ाई और लेखन सीखने की क्रेडिट माता रीना चौरसिया की चरणों में समर्पित है। माँ के आशीर्वाद और लिखने की कला के प्रति प्रेरणा लें मैं साहित्य की सीढ़ी चढ़ रहा हूँ। उनके पिता हरिकेश चौरसिया एक किसान परिवार से ताल्लुक रखते थे, जिसके कारण उन्हें वो शिक्षा नहीं मिल पाई और खेती किसानी ही करते रहे। मगर उनकी मां ने बी.ए और एम.ए किया हुआ है। जिसका प्रभाव उनके तीन बच्चों पर पड़ा। एक बड़ा बेटा अरुण और दो छोटी बेटियां अनामिका और अंशिका चौरसिया। बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सके और वो एक गांव से निकल कर समाज में कुछ कर सकें, इसके लिए उनकी मां एक छोटे से स्कूल में पढ़ाने जाती थीं। मां-बाप के सपोर्ट, आर्थिक तंगी और सामाजिक बाधाओं को दूर करते हुए, अरुण ने आज ये मुकाम हासिल किया। उनकी मेहनत और जुनून ने उन्हें बाबा साहेब भीम राव अंबेडकर विश्वविद्यालय में पत्रकारिता में मास्टर्स की पढ़ाई तक पहुंचाया। इसके साथ ही, उन्होंने नेट-जेआरएफ का एग्जाम पास कर अपनी योग्यता साबित की और इन सब के अलावा कई बड़े मीडिया संस्थानों में काम भी किया।

युवाओं को मल्टी टैलेंटेड होना होगा…

अरुण का मानना है कि आज का युवा प्रतिभा से भरा हुआ है, बस उसे सही दिशा देने की जरूरत है। उनके अनुसार, पढ़ाई के साथ-साथ स्किल डेवलपमेंट पर ध्यान देना बेहद जरूरी है। चाहे वह लेखन हो, बोलना हो, पेंटिंग हो, वीडियो बनाना हो या कोई और कला, हर युवा को मल्टी टैलेंटेड होना होगा। वो आगे कहते हैं कि आज के युवा को नंबरों की दौड़ में न पड़कर ज्ञान के पीछे भागना चाहिए। हर उस चीज को पढ़ना चाहिए, जो आपको आनंद दे। किताबें, कहानियां, इतिहास, कुछ भी, बस पढ़ते रहिए। उनका यह संदेश आज के युवाओं के लिए एक नई राह दिखाता है, जहां केवल सरकारी नौकरी ही लक्ष्य नहीं, बल्कि समाज और स्वयं का विकास भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

मां के योगदान ने बेटे को लायक बनाया…
लॉकडाउन के कठिन समय में, जब लोग निराशा के साये में थे, मऊ की गलियों में अरुण चौरसिया साइकिल पर अपने हाथों से बनाया मसाला बेचते थे। एक साधारण किराने की दुकान चलाने वाले माता-पिता की संतान, अरुण ने आर्थिक तंगी और सामाजिक बाधाओं को पार कर पहले लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक फिर बाबा साहेब भीम राव अंबेडकर विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में मास्टर्स के सफर तक पहुंचे। उनकी मां रीना चौरसिया, जो स्वयं बी.ए. और एम.ए. की डिग्री धारक हैं, उन्होंने अपने तीन बच्चों, अरुण, अनामिका और अंशिका को बेहतर शिक्षा के लिए प्रेरित किया। मां के छोटे स्कूल में पढ़ाने और पिता हरिकेश के किसान परिवार से होने के बावजूद, अरुण ने नेट का एग्जाम पास कर और कई बड़े मीडिया संस्थानों में काम कर अपनी योग्यता साबित की।

ग्रेजुएशन में गुरु से मिला लेखन का मंत्र…

लखनऊ में ग्रेजुएशन के दौरान अरुण के गुरु अमित सिंह ने उनमें पढ़ने की जिज्ञासा जगाई। गीता, वेद, पुराण से लेकर साहित्य तक, अरुण ने किताबों की दुनिया में गोता लगाया। धीरे-धीरे कविताएं लिखने लगे और एक प्रतिष्ठित अखबार में नौकरी के दौरान हर शनिवार प्रेम कहानियां लिखीं, जो बाद में उनकी पहली किताब प्रेमावली बनी। इसके बाद, 2022 से शुरू हुआ उनका अध्यात्म पर शोध काशी की गलियों में पूरा हुआ और एक और खूबसूरत किताब का रूप लिया। जिसका नाम मैं मणिकर्णिका हूं पड़ा।

लिखने से पहले पढ़ना बेहद जरूरी…

अरुण आज के युवाओं को सलाह देते हैं कि साहित्य और लेखन में रुचि रखने वालों को खूब पढ़ना चाहिए। किताबें नए विचार और दृष्टिकोण देती हैं, जो लेखन का आधार बनते हैं। वे कहते हैं कि बिना पढ़े लिखना अधूरा है, क्योंकि किताबें न केवल ज्ञान देती हैं, बल्कि सोचने की नई दिशाएं भी खोलती हैं। अरुण का मानना है कि युवाओं को दुनिया भर की किताबें पढ़नी चाहिए, चाहे वह साहित्य हो, दर्शन हो या अध्यात्म। उनकी यह सलाह उनकी अपनी यात्रा से प्रेरित है, जहां पढ़ने ने उन्हें एक साधारण मसाला बेचने वाले से लेखक और पत्रकार बनने तक का सफर तय कराया।
इनकी कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं। एक छोटे से गांव से निकलकर, आर्थिक तंगी और सामाजिक बाधाओं को पार करते हुए, उन्होंने न सिर्फ अपनी पढ़ाई पूरी की, बल्कि साहित्य और पत्रकारिता में अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी किताबें और उपलब्धियां इस बात का सुबूत हैं कि अगर मन में जुनून और मेहनत करने का जज्बा हो, तो कोई भी मंजिल असंभव नहीं। अरुण आज न केवल मऊ के लिए, बल्कि पूरे देश के युवाओं के लिए एक प्रेरणा हैं, जो यह सिखाते हैं कि सपने देखने और उन्हें पूरा करने का साहस ही इंसान को आगे ले जाता है।

One thought on “20 साल की उम्र में मऊ के अरूण ने लिखी दो किताब! “मैं मणिकर्णिका हूं” व “प्रेमावली”

  • Dr GulabChand Patel

    डिअर अरुण को कम उम्र में मणि कर्णिका प्रेमा वलीं लिखने पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *