रचनाकार

गजब प्रेम-बंधन यही रक्षाबंधन, भरोसा है भाई तो डोली चली है

@प्रमोद कुमार अनंग…
बहन हाथ में ले के रोली चली है।
यहां नौजवानों की टोली चली है।।
कसम खाके उसने दिया सूत्र रक्षा।
सजा थाल गढ़ के रंगोली चली है।।
धरा पर गजब पर्व है भाइयों का।
बहन स्नेह का रंग घोली चली है।।
सजेंगे कलाई ,बली होंगे भाई।
आशीष भर-भरके झोली चली है।।
गजब प्रेम -बंधन यही रक्षाबंधन।
भरोसा है भाई तो डोली चली है।।
सभी पर्व- त्यौहार भाई बहन से।
दशहरा दिवाली औ’ होली चली है।।
झुका शत्रु तलवार भी गिर पड़े हैं।
बहन हाथ में लेके मौली चली है।।
बहन बांध देती है पूरब से पश्चिम।
वो रामेश्वरम से चमोली चली है।।
उदर एक हो यह जरूरी नहीं है।
जहां-जान देंगे जो बोली चली है।।
उमड़कर मेरे आंसुओं ने था रोका।
मुझे छोड़ जब मुंहबोली चली है।।
ये जन्मों का बंधन है रोना न भैया।
बड़े कष्ट में कह के भोली चली है।।…” अनंग “

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