हॉं विस्मय! है सब भुलाने को…
@विनोद भारतीय…
तड़प रहे प्रिये तुमसे मिलने को,
देह धंसी चेतना बंधन प्रेम को।
सा उज्ज्वल कीर्ति ईश्वर कृष्णा को,
ऊॅं राधा तैर लेती ब्रम्हा को।।
जलता दीपक मिटाने अंधियारा को,
बुझती लौ की आस सहारा को।
पर समय है कितना तन्हाई को,
झकझोर दे मन रूसवाई को।।
पत्थर हुआ हृदय की गहराई को,
ठहर सका संकर तू लड़ाई को।
स्ववदं न भी नही हाय सन्नाटे को,
हॉं विस्मय ! हैं सब भुलाने को।।
लेखक विनोद भारतीय
सहादतपुरा, निकट रोडवेज मऊ उ0प्र0 के निवासी हैं, सुबह अख़बार बाँटते हैं और हलुवाई हैं।
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