रचनाकार

कविता : नारी दर्पण

विद्या : व्यथा…

( विजयलक्ष्मी )

बचपन से लेकर बुढ़ापे तक के सफर का आज आइना दिखाते हैं,

नारी का जीवन तीन ‘प, के है आधीन  ये बतलाते हैं।।

पहला ‘प, है पिता, जो बचपन से जवानी तक सही राह पर चलना सिखाता है,

बचपन से दहलीज से बाहर की कुरीतियों से बचना बतलाता है।।

अच्छा वर,घर,परिवार देख, कन्या दान कर डोली में बिठाता है,

सांसारिक जीवन में नेकी की राह पर चलना बेटी यही सीखाता है।।

अब नारी जीवन में दूसरे ‘प, का स्थान पति के रुप में आता है,

पिता के घर से पति के साथ नारी ससुराल में आती है।।

यहां से एक नारी जीवन के सफर में नवजीवन पाती है,

पति को जीवनसाथी और सास-ससुर में मां-बाप की छवि देख पाती है।।

भारत में सांसारिक बंधनों में बंध नारी अपना हर फर्ज निभाती है,

दुःख हो या सुख हंसते हुए जीवन नैया पार लगाती है।।

कुछ समय के बाद घर परिवार में खुशियां मनाई जाती है,

पुत्र रत्न को पा करके नारी सब दर्द भूलकर खुशियों में खो जाती हैं।।

बेटे को पालते हुए उसमें अपना बचपन देख पाती हैं,

खुद को नजरंदाज कर उस पर सारी खुशियां लुटाती है।।

ऐसा करते हुए समय का पता नहीं चला बेटा जवान हो जाता है,

अब नारी पर तीसरा ‘प, पुत्र अपना अधिकार जमाता है।।

देखिए! कैसी विडम्बना है,वहीं पुत्र मां की बातों को नजरंदाज कर जाता है,

अंत में नारी का जीवन तीन ‘प, में सिमट कर रह जाता है।।

लाडो से पाली हुई बेटी का जीवन यूं ही फर्ज की राह में बिखर जाता है,

विजयलक्ष्मी है कहती,घर से अस्थियों का सफ़र यूं ही कट जाता है।।

तीन ‘प, के आधीन फर्ज निभाते हुए नारी जीवन यूं ही सिमट जाता है,

कहते हैं बराबर का दर्जा है नारी, मुझे तो बस य कागजों में नज़र आता है।।

One thought on “कविता : नारी दर्पण

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *