शब्द मसीहा की कहानी: मजबूरी नहीं सौभाग्य
शब्द मसीहा केदारनाथ…
“अरे बेटा! खाना तैयार हो गया है, जल्दी से आ जाओ और गरम-गरम रोटी खा लो।” माँ ने अपने बेटे को पुकारा।
“माँ! सब्जी क्या बनाई है?” बेटे ने अपने लैपटॉप पर काम करते हुए पूछा।
“बेटा! सुबह मैंने भिंडी बनाई थी, मेरी तबीयत अच्छी नहीं थी, तो मैंने अपने लिए थोड़ी-सी खिचड़ी बना ली थी। तेरे छोटे भाई ने भी सुबह भिंडी खाई। दोपहर का खाना लेकर नहीं गया था तो शाम को मैंने कोई सब्जी नहीं बनाई। सब्जी बेकार ही फेंकनी पड़ती बेटा।” माँ ने कहा।
“कमाल करती हो माँ, तीन ही लोगों का तो खाना बनाना होता है, दोनों टाइम एक ही सब्जी खाओ…. हद हो गई है कंजूसी की। मुझे नहीं खाना है। मैं अपने लिए पिज़्ज़ा ऑर्डर कर रहा हूँ।”
माँ ने छोटे बेटे के लिए खाना लगाया और प्लेट लेकर उसके कमरे में चली गई। कुछ देर तक वह बेटे के पास ही बैठी रही और उसकी पढ़ाई के बारे में उससे बातें करने लगी।
कुछ देर बाद दरवाजे पर दस्तक हुई। पिज़्ज़ावाला आया होगा ऐसा सोच कर बड़े बेटे ने दरवाजा खोला और पिज्जा उसके हाथों से लेने के बाद अपने पर्स से पैसे निकालकर देने लगा।
“रुको भाई, आपसे एक बात कहनी है।” पिज्जावाला बोला।
“हाँ कहो।”
“बात यह है कि मैं यहाँ पर अपनी पढ़ाई भी करता हूँ और साथ-साथ यह पिज़्ज़ा डिलीवरी का काम भी करता हूँ। आपके यहाँ कई बार मैं पिज्जा लेकर आया हूँ।”
“ओह, आप पढ़ाई भी कर रहे हैं, और पैसा भी कमा रहे हैं।”
“हाँ, पिज़्ज़ा डिलीवरी करना मेरे लिए काम नहीं है, मेरी मजबूरी है कि मुझे अपना खर्चा खुद ही उठाना है। मेरे गांव में मेरी माँ और मेरे दो भाई बहन हैं। कई महीनों से मैं अपने गांव भी वापस नहीं गया। आपको यह पिज्जा मैं मुफ्त में दे रहा हूँ, क्या आप इसके बदले मुझे दो रोटियां दे सकते हैं?” पिज्जावाला बोला।
“दो नहीं मैं तुम्हें चार रोटी दे सकता हूँ और साथ में भिंडी की सब्जी भी है। कहो तो प्याज भी ले आता हूँ।”
“बहुत शुक्रिया भाई।” पिज्जावाला खुशी से हाथ जोड़ते हुए बोला।
“पर तुम फ्री पिज्जा देकर रोटी क्यों माँग रहे हो? तुम इतना शानदार पिज्जा भी तो खा सकते थे।” लड़के ने पूछा।
“हाँ, मैं पिज्जा भी खा सकता हूँ, और अक्सर पिज्जा खाता भी हूँ, लेकिन कल रात मेरी माँ का फोन आया था, मुझे यहाँ पर माँ के हाथ की रोटी नहीं मिलती। मैंने देखा है कि तुम्हारी माँ तुम्हारे साथ रहती है, तुम्हें रोज तुम्हारी पसंद का खाना मिल जाता है, लेकिन मैं माँ के हाथ का खाना खाने के लिए तरसता रहता हूँ।” पिज़्ज़ा वाले ने कहा।
लड़का पिज्जा वाले की बात सुनकर हैरान हो गया। उसने पिज्जावाले को अंदर बुलाया और सोफे पर बैठने को कहा। फिर वह रसोई में गया और प्लेट में चार रोटियां, भिंडी की सब्जी, कटा हुआ प्याज और नींबू लेकर आया।
“लो भाई, अब आराम से खाना खा लो। यह कुछ पैसे भी रख लो, तुम्हारे काम आएंगे। तुम्हें तुम्हारी माँ की याद आती होगी, अपने भाई की याद भी आती होगी। मैं अपनी माँ और भाई को बुला कर लाता हूँ।” कह कर लड़का दूसरे कमरे में चला गया।
जैसे ही माँ और उस लड़के का छोटा भाई सहित वह कमरे में पहुंचे तो खाना खाते हुए पिज़्ज़ावाला उठा और उस लड़के की माँ के पैर छू लिए।
“मुझे मेरे बेटे ने सब बता दिया है, बेटा! जब तुम्हारा मन किया करे तुम खाना खाने के लिए आ सकते हो। और हाँ, इसे भी समझा दो कि घर का खाना खाते समय मजबूरी नहीं होती सौभाग्य होता है।” कहते हुए माँ ने अपने दोनों बेटों के सिर पर मुस्कुराते हुए हाथ रख दिया।
शब्द मसीह

