खास-मेहमान

अजनबी

कालेज के सुहाने दिन , फिर उसी कालेज में चयन और तलाक बस इतनी सी ही तो कहानी थी उसकी . मगर जीना कहाँ छोड़ा था उसने . वह भी तो सिर्फ प्रेमिका ही रह जाना चाहती थी , उसे पति होना खलता था अशोक का .

दिल्ली के पुराने किले में कालेज के टूर पर इत्तेफाक से अशोक और माधुरी दोनों ही आये हुए थे बच्चों के साथ . तितलियों की तरह बच्चे कभी यहाँ -कभी वहां, हँसी-चुहल चल रहा था . लडके-लड़कियाँ अपने-अपने ग्रुप में मस्त इस मौसम का आनंद ले रहे थे . कोई फोटो खीँच रहा था तो कोई इस किले का इतिहास बता रहा था .

कुछ देर बाद एक लड़की हाँफती हुई आई – “माधुरी मैम ! उधर रणजीत ऋचा के साथ जबरदस्ती कर रहा है .”

माधुरी तेजी से उठी और उसके पीछे चल पड़ी . सुनसान सी जगह से ऋचा के चिल्लाने की आवाज आ रही थी . माधुरी को उस ओर जाते एक अजनबी ने देख लिया था . वह भी उसी ओर चल पड़ा .

“बदतमीज ! क्या कर रहे हो ये . छोडो इसे .” माधुरी ने चीखते हुए कहा .

“आप जाइए यहाँ से . जानती नहीं हैं मैं कौन हूँ . एक फोन करवा दिया तो कालेज में दिखाई भी नहीं दोगी ..रणजीत का मन आ गया है . साली बहुत दिन से सता रही है .”

“बकवास बंद करो . मेरे रहते तुम ऐसा कुछ नहीं कर सकते इसके साथ .” माधुरी बोली .

“मैडम ! प्लीज बचाओ मुझे . इसके पास चाकू है . पुलिस बुलाओ … ये मुझे मार डालेगा .” नीचे पड़ी ऋचा कातर स्वर में चिल्ला रही थी .

“ले अभी बुलाता हूँ पुलिस तेरे लिए …देख …रणजीत जब अपनी पे आता है तो क्या कर सकता है .” और उसने माधुरी पर भरपूर ठोकर का प्रहार किया . माधुरी लहराते हुए चीखती एक ओर गिरने लगी . तभी दो मजबूत हाथों ने उसे थाम लिया . जरा सा सम्हली ही थी कि रणजीत के मुँह पर उस व्यक्ति ने भरपूर ठोकर जड़ दी . रणजीत जमीन पर धूल चाट रहा था . जैसे ही उठने की कोशिश की एक लात पसलियों पर पड़ी . भयानक चीख से विराना गूँज उठा . अजनबी ने लड़की को सहारा देकर उठाया और रणजीत की जेब का चाकू अपने कब्जे कर लिया .

लड़की ऊपर भागने लगी थी . तब तक और भी बच्चे आ गए थे . रणजीत को भी लड़कों ने उठा लिया था .

माधुरी की नजर जैसे ही अशोक पर पड़ी वह अचंभित रह गई .

“अशोक ! अगर आज तुम सही समय पर नहीं पहुँचते तो न जाने मेरा क्या होता . पर तुम अचानक कैसे ? क्या तुम्हें मालूम था कि मैं यहाँ आ रही हूँ ?” माधुरी बोली .

“नहीं, ये इत्तेफ़ाक है . तुम्हारी शर्त के हिसाब से मैंने कभी तुम्हें अपना चेहरा नहीं दिखाना चाहा . मैंने ट्रांसफर भी इसी लिए करवाया था . मगर जिस तरह उस रोज तुम्हारा ख़त मुझतक पहुंचा था उसी तरह ये टूर भी मेरे साथी की तबियत खराब होने से मुझे मिला है . हाँ, ये बात अलग है कि चाहता मैं तुम्हें आज भी हूँ . तलाक सिर्फ दो जिस्मों को अलग कर सकता है दो सोचों को नहीं …दिलों को नहीं .” अशोक ने ये कहा और दूसरी तरफ मुड़ गया .

“सर ! थैंक्स . आपने मेरी और मेडम की हेल्प की .” ऋचा ने हाथ जोड़ते हुए कहा . अशोक ने उसके सिर पर हलके से हाथ रखा और मुस्कुराते हुए बोला –

“बेटियाँ कभी थैंक्स नहीं कहतीं .”

माधुरी के जहन में वे उसके लगाये सारे आरोप एक पल में झर पड़े जैसे बहार आने पर पीले पत्ते झर जाते हैं .

“मुझे न ले चलोगे ऊपर तक . मुझे क्या चोट नहीं लगी है !” माधुरी ने आँसू भरी आँखों से मुस्कुराते हुए कहा . अशोक ने अपनी बाहें फैला दीं. मगर माधुरी तो बाहों में किसी बच्ची सी झूल गई . तब अशोक ने किसी हीरो की तरह उसे उठाते हुए कहा –

“क्या अब भी तुम्हें शक है कि समय दोस्ती और प्यार को खा जाता है ?”

“मैडम ! ये सर कौन हैं ?” एक लड़की ने बोला .

“अजनबी कर दिया था इन्हें पर मेरे अपने हैं .”

उस चौड़े माथे पर अशोक के नाम की बिंदी अब भी मौजूद थी और अनार दानों की तरह सजे हुए उसके दांत मिलन की इस चमक से और खूबसूरत हो गए थे .

शब्द मसीहा

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