खास-मेहमान

“अर्थव्यवस्था सुदृढ़ीकरण केंद्र”

शब्द मसीहा केदारनाथ की कहानी…

बहारो मेरा जीवन भी सँवारो ….. मैं अपनी मस्ती में ये गाना गुनगुना रहा था और घर में झाड़ू कर ने के बाद पोछा लगा रहा था । तभी पत्नी आई और बोली- “कौन है कलमुंही जो तुम्हें बहार लग रही है? कितनी भी बहार देख लो सपनों में मगर ये याद रख लो और अच्छे से समझ समझ लो कि रहना तो यहीं है।”

हमने सोचा की शायद उच्चारण की समस्या न हो। पत्नी जी ने कहीं बाहर समझ लिया हो।

“अरे! भागवान, तुम्हारे परिवार से प्यार ही इतना है कि और कुछ सुझाई नहीं देता…..बस तुम और तुम्हारा परिवार ही ख्यालों में रहता है हमारे।” हमने भी बात को सरल करते हुए कहा। लेकिन सरल बातें ही अक्सर कठिन होती हैं।

“मेरे यहाँ बहार कौन है? शर्म नहीं आती सुबह-सुबह झूठ बोल रहे हो।” पत्नी ने अपना चिररिचित रूप दिखाया।

“है ….कोई एक है, पर मुझ से गलती हो गई।” मैंने भी मुस्कुराते हुए कह दिया। पत्नी के सामने मुस्कुराने की भयंकर गलती कोई मेरे जैसा ही कर सकता है, सो तुरंत रिजल्ट आया।

“गलतियाँ करने के अलावा और तुम्हें आता भी क्या है? बादाम रोगन लिया करो या दीमागीन ….. बड़े आए …बहार देखने वाले!” पत्नी ने जैसे गरीब आदमी की फटी जेब पर ताना कसा था।

“मेरे दिमाग की दही मत करो ….बहार है तो है। मेरी नजर से देखो कभी।” मैंने भी दिल की बात ज़ुबान पर लाकर कह ही दिया।

“मेरा चश्मा ही सूट करता है मुझपर …जरूरत नहीं तुम्हारे बाबा आदम के चश्मे से देखने की मुझे। चलो ….बताओ कौन है मेरे परिवार में बहार ?” पत्नी भी आज सी बी आई की तरह इस गुत्थी को सुलझाने की जैसे कसम ही खाकर खड़ी थीं।

”साली है न …… आज उसकी याद आ रही थी। कितनी सुंदर और सुशील है …..बस जरा मोटी ही तो हो गई है, लेकिन जब भी मुस्कुरा के बात करती है ….. जीजा जी कहती है, कलेजा हील हो जाता है मेरा।” मैंने भी “हील” पर जरा ज़ोर देते हुए कहा।

“अच्छा तो ये बात है …उसके कहने से कलेजा हील हो जाता है और मैं क्या कील हूँ। इतनी ही चुभती हूँ तो मुझे निकाल बाहर क्यों नहीं कर देते ?” अब वे अपने रौद्र रूप का प्रदर्शन करने पर उतारू हो चुकीं थी।

“कर तो देता ….मगर ये गोल-गोल रोटियाँ कौन बनाएगा ….फिर तुम्हें झेलने का आदी भी हो गया हूँ। जिम जाने के पैसे लगते हैं। तुम तो सुबह जो काम बताती हो ….वो तो फिट रखने के और तुम्हारे आत्मनिर्भरता के नुस्खे हैं …इतनी समझदार पत्नी को कोई मूर्ख ही निकालेगा न ….और तुम तो जानती हो कि मैं मूर्ख नहीं हूँ।” मैंने मौके की नजाकत भाँपते हुए कहा। अब लॉक डाउन में बीबी से पंगा लिया तो बाहर से सूजी वायरस आने का खतरा भी पक्का है। आदमी कोरोना से निपट सकता है गोली दारू खा के मगर बुढ़ापे में सूजी वायरस को झेलना बहुत टेढ़ी खीर है।

“मस्का मार रहे हो मुझे …..सब समझती हूँ। नाश जाय इन फेयर लवली वालियों का …टी वी पे आ के ऐसे सपने दिखाती हैं मर्दों को कि बाहों में झाड़ू भी इन्हें वही लगती है। हम औरतों का जीना दूभर कर दिया है इन करमजली बकरियों ने। तुम्हारी नस-नस को जानती हूँ मैं ….समझते क्या हो अपने आप को तुम।” हम तो घबरा गए थे। साला एक गाना आदमी की ज़िंदगी में कितना ख़लल पैदा करता है अब समझ आ रहा था हमको।

“अरे! जानू, ऐसी बात नहीं है …. प्यार तो तुमसे करते ही हैं …नहीं तो अपने ये दो ऊंट आँगन में कैसे जुगाली कर रहे होते।” हमने प्यार जताते हुए कहा।

“मेरा शक सही निकला न ….ऊंटनी कहा तुमने मुझे। खुलने दो लॉक डाउन मैं अपने घर चली जाऊँगी। आत्मनिर्भर हूँ …नौकरी करती हूँ। किसी पर बोझ थोड़े ही हूँ।” अब ऐसे लगता था जैसे पाकिस्तान की प्रधानमंत्री हमें धमका रही हो।

“अरे! वाह, लगता है मोदी जी का भाषण तुमने सुना है। आत्म निर्भरता ही मूल मंत्र है। हमें भी इसमें योगदान देना चाहिए। आज ही पाँच–सात किलो अंगूर और संतरे लेकर आता हूँ।” मैंने बात पलटते हुए कहा।

“कोई जरूरत नहीं कुछ भी लाने की …पिछली बार मौसमी उठा लाये थे और संतरा बता रहे थे। पर पाँच-सात किलो का तुम करोगे क्या?” उनका गणितीय दिमाग जैसे जाग्रत हुआ था। हो सकता है इसमें राजनीति ज्ञान का भी उपयोग किया हो।

“आत्म निर्भर बनूँगा और “अर्थव्यवस्था सुदृढ़ीकरण केंद्र” पर कभी नहीं जाऊंगा।” मैंने भी जोश में भरकर कहा।

“ये “अर्थव्यवस्था सुदृढ़ीकरण केंद्र” क्या बला है? और तुम आत्मनिर्भर किस चीज में होना चाहते हो?” तुरंत उधर से सवाल की बोफोर्स दागी गई।

“हा हा हा …. अब वो बादाम और दीमागीन तुम खा पी लेना। घंटाभर का मोदी जी का भाषण यूं ही सुना था तुमने? मैंने केवल झलकीभर देखी थी, और अपना निर्णय ले लिया है कि “अर्थव्यवस्था सुदृढ़ीकरण केंद्र” पर मैं नहीं जाऊंगा।” मैंने भी अपना निर्णय सुना दिया था।

“बार-बार ये हिन्दी का कठिन सा जुमला तुम क्या गा रहे हो? बताओ तुम्हारा मतलब क्या है इस “अर्थव्यवस्था सुदृढ़ीकरण केंद्र” से।” पत्नी हैरानी से झल्लाती हुई बोली।

“कितना कहा था कि अपना एम ए राजनीति शास्त्र में अङ्ग्रेज़ी में मत करो। अब पता चला न ….हिन्दी कितनी उत्कृष्ट भाषा है।” मैंने पोछे की बाल्टी को एक तरफ करते हुए कहा।

“बस तुम्हें तो मेरी अङ्ग्रेज़ी से ही चिढ़ है। खुद तो अङ्ग्रेज़ी जानते नहीं और मेरी अङ्ग्रेज़ी पर सवाल उठा रहे। जल्दी से इसका मतलब बताओ।” पत्नी ने कहा।

“बच्चन जी का नाम सुना है कभी?” मैंने पूछा।

“अमिताभ बच्चन को कौन नहीं जानता ….वो कौन बनेगा करोड़पति वाले ….बहुत अच्छे एक्टर हैं। बचपन से उनकी फिल्में देखती आ रही हूँ। दो बूंद ज़िंदगी की ….पोलियो का एड भी करते हैं।” पत्नी बताया, और हम खुश थे कि किसी टी वी सीरियल का नाम नहीं लिया।

“इसीलिए तो कह रहा था। अमिताभ का संबंध सिर्फ शराबी फिल्म से था मगर उनके पापा का संबंध “अर्थव्यवस्था सुदृढ़ीकरण केंद्र” से है। तुम रहने दो, समझ नहीं आएगा तुम्हें। कहाँ राजनीति शास्त्र और कहाँ जीवन की मधुशाला …..आह!” हमने भी मजे लेने के मूड में प्रिय पत्नी को चिढ़ाते हुए कह दिया।

“तुम बड़े और सभ्य लोगों से हमेशा जलते हो …..हिन्दी में एक मधुशाला क्या आ गई ….हिन्दी …हिन्दी की रट लगाए रहते हो। जानते हो अङ्ग्रेज़ी में एक से एक बड़े थिंकर और लेखक हुए हैं। तुम्हारे लोग उनके आइडिया चुराकर लिखते रहते हैं। बड़े आए मधुशाला बताने वाले। मैंने उसका अनुवाद पढ़ा है।” पत्नी ने कहा।

“अनुवाद में वो मजा कहाँ है, जो ओरिजनल में है ….हा हा हा ….पुअर अङ्ग्रेज़ी वाली ….हा हा हा।” मैंने हँसते हुए कहा।

“उड़ा लो मज़ाक ….. लेकिन फिर भी ये जो तुम्हारा घटिया सा डायलाग है न …. “अर्थव्यवस्था सुदृढ़ीकरण केंद्र” इसका मतलब तो मुझे जानना ही है। बताओ मुझे!” पत्नी ने इस हिन्दी के जुमले पर झल्लाते हुए कहा।

“हा हा हा …. देखा! आना पड़ा न अङ्ग्रेज़ी को घुटनों पर।” मैंने फिर चिढ़ाया पत्नी को।

“बताते हो या लगाऊँ पुलिस को फोन कि कई दिनों से इनकी नाक बह रही है और खांसी भी आ रही ….सीधे जाओगे अस्पताल में…कोरोना के केस में।” पत्नी की धमकी बहुत भारी थी।

“देखो …इसका मतलब होता है मधुशाला। सरकार ने शराब के ठेकों को खोल दिया है और उस पे सत्तर परसेंट कोरोना टैक्स भी है …बाकी दूसरे टैक्स छोड़ के। मधुशाला से ही देश की अर्थव्यवस्था चल रही है इसलिए हम अब ठेके का नाम सम्पूर्ण सम्मान के साथ लेते हैं …. “अर्थव्यवस्था सुदृढ़ीकरण केंद्र” ।” मैंने राज़ खोल ही दिया।

“ओह! तो इसका मतलब ये हुआ कि तुम संतरों और अंगूर से खुद दारू बनाकर आत्मनिर्भर होना चाहते हो …. मुझे पुलिस में खबर करनी ही पड़ेगी। जब पीसींग चक्की इन द जेल …तब पता चलेगा तुमको कि कैसे मजबूती आती है।“ पत्नी ने तुषारापात करते हुए अपना मुँह बिचकाया।

“ठीक है ….आत्म निर्भर नहीं बनेंगे, मगर जानू देश सेवा करने का हक तो हमसे मत छीनों …..वरना हम अपनी पे आ गए तो ….. ।“ हमने भी धमकी दे दी।

“क्या कर लोगे, अपनी पे आ के? हाथ तो लगा के देखो जरा।” वे जैसे गुर्राई थीं।

“बता रहे हैं ….मंटो नाम के भूत से हमारी दोस्ती है, और उसकी बहुत सारी चुड़ैलों से। अगर उसको बोल दिया कि तुम हमें डरा और धमका रही हो तो समझ लो, तुम्हारी खैर नहीं। देश के सारे मंत्री उसके पक्ष में आ जाएँगे और पुरुष प्रताड़णा कानून के अंतर्गत हम अत्याचारी महिलाओं का विरोध करेंगे और उन्हें जेल भिजवाएंगे।” मैंने भी कोरी धमकी सुना दी।

“हाय राम! मैं तो मज़ाक कर रही थी। तुम चले जाना “अर्थव्यवस्था सुदृढ़ीकरण केंद्र” पर लेकिन थोड़ी-सी ही पीना। घर में बच्चे बड़े हो रहे हैं।” पत्नी ने कहा।

“ठीक है….आज जाने दे रहे हैं। घर का मामला है ….घर में ही रहे। वैसे भी हम ऐसी–वैसी चीज को मुँह नहीं लगाते ….वो तो हम भी मज़ाक कर रहे थे ….यार! जरा चाय तो बना दो।” हमने कहा।

“जीवन में पिया तेरा साथ रहे ……”

वो गाती हुई चली गई है रसोई में। “अर्थव्यवस्था सुदृढ़ीकरण केंद्र” पर जाना केंसिल। हम अपनी बर्बादी को न्योता खुद ही क्यों दें। हम कोई बेबड़े थोड़े ही हैं।

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