रचनाकार

शब्द मसीहा : सर्टिफाइड साला

( शब्द मसीहा केदारनाथ )

मृदुल और मयंक दोनों के बचपन के दोस्त थे। दोनों की पढ़ाई भी एक ही कॉलेज में हुई थी, लेकिन मृदुल के पिताजी अपना व्यापार करते थे, और गांधी नगर मार्केट के अंदर उनकी कपड़े की बड़ी दुकान थी। कॉलेज की पढ़ाई खत्म होने के बाद मृदुल ने अपने पिताजी का कारोबार संभाल लिया, और मयंक कई जगह सरकारी नौकरी के लिए मारा- मारा फिरता रहा। अंत में यह हुआ कि मयंक को एक दिन गांधीनगर में ही किसी दूसरी दुकान पर काम करना पड़ा। मृदुल का और मयंक के मालिक का आपसी व्यापारिक लेन-देन चलता था।

एक रोज मयंक के मालिक ने मृदुल को पेमेंट लेने के लिए भेजा। और जिस रोज वह मृदुल की दुकान पर पहुंचा तो देख कर हैरान हो गया कि दुकान पर मृदुल के पिता नहीं हैं। दोनों दोस्तों की फोन पर तो बात हो जाती थी, लेकिन कोरोना काल की वजह से मिलना जुलना कम हो गया था। लगभग दो साल से वे एक दूसरे से नहीं मिले थे।

जब मृदुल ने मयंक को देखा तो उसे बहुत खुशी हुई कि उसका दोस्त उससे मिलने के लिए आया है। दोनों एक-दूसरे के गले मिले, लेकिन मयंक के मिलने में आज वह गर्मजोशी नहीं थी, वह बराबरी का अहसास नहीं था, जो कभी पहले हुआ करता था।

“अरे छोटू! भाई आया है, जरा चाय तो लेकर आ।” मृदुल ने अपने नौकर से कहा।

“अरे नहीं दोस्त, चाय पीने का समय नहीं है। मैं तो खन्ना साहब की पेमेंट देने आया था।”मयंक ने कहा।

“क्या मतलब?”

“मतलब कुछ नहीं भाई, साली नौकरी कहीं मिली नहीं, तो सोचा कि पापा के ऊपर बोझ बनने और घर में बैठे रहने से तो अच्छा है कि कोई काम ही कर लिया जाय। खन्ना साहब के यहाँ पर बीस हजार रुपये महीने में नौकरी करता हूँ। दुकान से आने जाने वाले सामान का हिसाब किताब रखता हूँ, और कई बार पेमेंट लेने देने के लिए भी मुझे ही जाना होता है। पर एक बात बता, बाबू जी नहीं दिखाई दे रहे हैं? सब ठीक-ठाक तो है?” मयंक ने पूछा।

“यार! बाबूजी को अचानक से लकवा मार गया, मार्केट का बहुत सारा पैसा देना था, टेंशन होने की वजह से दौरा पड़ा, और अब घर में ही रहते हैं। मजबूरी में मुझे काम करना पड़ रहा है। साला यह ज़िन्दगी भी कोई ज़िन्दगी है, सुबह आओ और शाम तक यहाँ दुकान पर बैठे रहो। दुकान बहुत समय तक बंद रही थी तो काफी कर्जा हो गया था, और उसी टेंशन में पापा को यह बीमारी हो गई। लेकिन तू बता तुझे क्या जरूरत पड़ गई जो तूने सिर्फ बीस हजार की नौकरी कर ली? तू तो पढ़ाई में भी बहुत होशियार था।”

“अबे काहे की होशियारी। यह जो मार्कशीट के नंबर होते हैं न, साले कुछ भी नहीं होते। असली होशियारी तो तब पता लगती है, जब आदमी ज़िन्दगी के मैदान में उतरता है। भाई, नौकरी है नहीं, और बड़ी बहन की शादी करनी थी। पापा को मुझसे बहुत उम्मीद थी कि मैं कोई अच्छा काम करूंगा और पैसे कमा लूंगा, लेकिन मैं भी पढ़ा-लिखा बेरोजगार होकर घर में बैठ जाता, तो और भी बुरा लगता। इसलिए मैंने यही सोचा कि घर में कुछ तो कमाकर ले जाऊंगा सो यह छोटी-सी नौकरी मैंने कर ली। लेकिन बाबूजी का सुनकर बहुत दुख हुआ यार। मैं तो तेरे घर पर भी आता था बाबूजी मुझसे कितना प्यार करते थे। भगवान उनको जल्दी से ठीक कर दे। और हाँ, यह तेरी पेमेंट है। मुझे पर्ची पर साइन कर दे कि पेमेंट मिल गई है।” मयंक ने कहा।

मृदुल ने उसके हाथ से पैसे लिए और पर्ची पर साइन कर दिये।

“अरे भाई गिन ले। खन्ना की पेमेंट पहले भी एक दो बार कम निकली है। पता नहीं कैसा आदमी रख रखा है, ठीक से पैसे भी गिनकर नहीं देता है, और मेरी बेकार में ही बेइज्जती खराब होती है।” मयंक ने कहा।

“ठीक है, अरे छोटू…. यह पैसे मुनीम जी को दे, और उन्हें बोल कि मुझे इन को गिनकर बताएं, कितने पैसे हैं। और अंदर फ्रिज से दो बोतल निकालकर ला।” मृदुल ने नोटों की गड्डियाँ छोटू को पकड़ाते हुए कहा।

कुछ देर बाद दोनों दोस्त ठंडा पी रहे थे। छोटू ने आकर बताया कि पेमेंट ठीक है।

“पिताजी का इलाज कहाँ से चल रहा है?” मयंक ने पूछा।

“यार, डॉक्टर को दिखा रहे हैं लेकिन अभी तक तो बहुत ज्यादा आराम नहीं है। कहता है कि अब शायद उनके पैर में पहले जैसी ताकत नहीं आ पाएगी।” मृदुल बोला।

“अरे तू चिंता मत कर। मेरे पिताजी बता रहे थे कि उनके किसी दोस्त को भी ऐसा हुआ था। उनके दोस्त ने हरिद्वार के एक वैद जी से कोई तेल मंगवाया था, और अब वह पूरी तरह से ठीक है। अगर डॉक्टर के इलाज से फर्क नहीं पड़ रहा है, तो उसको भी ट्राई करके देख लेने में क्या बुराई है।” मयंक ने कहा।

“अभी तो पापा डॉक्टर की ही दवाई ले रहे हैं, उनके इलाज के बीच में कुछ और लेना ठीक नहीं है।” मृदुल ने कुछ सोचते हुए कहा।

“और यह तो बता कि सीमा से मुलाकात होती है या नहीं?”

“कहाँ होती है यार, अब ये झमेला गले में पड़ गया है, तो उससे मिलने का मौका ही नहीं मिलता। बस फोन पर ही बात हो जाती है। इधर पिताजी की चिंता रहती है, उधर काम की और सीमा की चिंता। कुछ समझ नहीं आता कि क्या करूं?” मृदुल ने उदास लहजे में कहा।

“यार दोस्ती बड़ी मुश्किल से होती है, मैं जानता हूँ कि सीमा बहुत अच्छी लड़की है। तुझसे प्यार भी करती है। उसका ख्याल रखना। अब मुझे चलना चाहिए। ज्यादा देर हो गई तो खन्ना बिना बात की बकबक करेगा।” मयंक ने उठते हुए मृदुल से हाथ मिलाया और दुकान से बाहर निकल पड़ा।

शाम को जब वह घर आया तो अपने पिताजी से मृदुल के पिताजी के बारे बताया और हरिद्वार के वैद जी का नंबर ले लिया। अगले दिन उसने वैद जी से बात कर के एक बस वाले का नंबर दिया और दवाई उसके हाथों मँगवा ली।

अगले ही दिन से वह मृदुल के घर पहुंच गया और बाबूजी को उस तेल की मालिश करना शुरू कर दिया। मयंक ने बाबू जी से कह दिया था कि जब तक वह ठीक नहीं हो जाते हैं, तब तक मृदुल को इस बारे में नहीं बताएंगे कि मैं आकर आपके हाथ पैरों की मालिश करता हूँ। धीरे-धीरे कर करीब दो महीने गुजर गए थे। बाबू जी के हाथ पैरों में अब काफी सुधार दिखाई देने लगा था। खाने की दवाई तो वह डॉक्टर की खा ही रहे थे, लेकिन इस तेल के प्रभाव से उनके हाथ और पैर में फिर से जान लौटने लगी थी।

एक रोज जब मृदुल अपने घर से निकलने लगा तो उसके पिताजी ने रोका।

“अरे बेटा! घर में पड़े-पड़े बहुत दिन हो गए। आज मैं भी दुकान पर जाना चाहता हूँ।”

“पर आपको तो चलने में तकलीफ होती है, दुकान पर आराम भी नहीं कर पाएंगे। आप घर में ही रहिए मैं तो हूँ न।” मृदुल ने कहा।

“अबे कौन कहता है कि अब मैं चल फिर नहीं सकता। देख, अब मैं बिल्कुल ठीक हो गया हूँ। घर में पड़े-पड़े मन भी तो नहीं लगता। मैं जानता हूँ कि अभी तेरी काम करने की नहीं बल्कि खेलने खाने की उम्र है।”

“नहीं पापा, आपके लिए आराम करना बहुत जरूरी है। अब मैं इतना छोटा भी तो नहीं रहा हूँ कि अपनी जिम्मेदारी को न समझ सकूँ। और काम का क्या है, अभी नहीं तो कभी तो मुझे काम करना ही था। अब आपको चिंता करने की जरूरत नहीं है, मैं हूँ न।” मृदुल ने कहा।

“अरे तेरे दोस्त मयंक का क्या हाल है? वह भी कहीं काम कर रहा है क्या? उसे किसी रोज घर बुलाना।”

“हाँ, उसे कहीं नौकरी नहीं मिल रही थी, गांधीनगर में ही खन्ना के यहाँ काम कर रहा है। अब नौकरी में है, इसलिए कभी-कभी मुलाकात हो जाती है, जब वह मुझे पेमेंट देने के लिए आता है।” मृदुल ने कहा।

“गधा है तेरा दोस्त, अरे काम ही करना था, तो तेरे साथ कर लेता, उस चोर खन्ना के यहाँ काम कर रहा है। उसे समझा देना कि खन्ना ज्यादा अच्छा आदमी नहीं है। और अगर उसके यहाँ ऐसे ही काम करता रहेगा, तो ज़िन्दगी में कभी आगे नहीं बढ़ पाएगा। वह जो अपनी दुकान हमने किराए पर दे रखी थी, उसका कॉन्ट्रैक्ट खत्म हो रहा है। ऐसा करो, उसे शाम को घर पर बुलाओ। उस दुकान को हम मयंक को किराए पर दे देंगे। बहुत अच्छा लड़का है, मुझे पूरी उम्मीद है कि उसकी दुकान वह जल्दी ही संभाल लेगा।” बाबू जी ने कहा।

“लेकिन पापा उसकी दुकान में माल कहाँ से आएगा? वह तो सिर्फ बीस हजार महीना कमाता है। नए आदमी को कौन उधार देगा? उसे पैसों की भी तो जरूरत पड़ेगी। और उसकी बड़ी बहन की शादी भी करनी है, इसलिए उसके पिताजी भी उसे पैसे नहीं दे पाएंगे।” मृदुल ने कहा।

“अरे वह सब छोड़ यार, मैंने तुझ से ज्यादा दुनिया देखी है। जिस आदमी ने तेरे बाप को ठीक किया है, क्या तेरा बाप उसके लिए कुछ नहीं करेगा? दुकान पर पहुंचकर अपने यहाँ बुला ले। कल ही मेरी बात हुई है, दस लाख रुपए की डूबी हुई पेमेंट मिलने वाली है। इतने पैसे का माल मयंक की दुकान में डाल देंगे, वैसे भी तो दो साल से डूबा ही हुआ था पैसा।” बाबू जी ने कहा।

“ये क्या कह रहे हैं आप? मयंक ने आप को ठीक किया है?” मृदुल ने चौंकते हुए कहा।

” हाँ, तू तो साढ़े नौ बजे यहाँ से निकल जाता था, और मयंक रोज आकर मेरे हाथ पैरों की मालिश करता था। तुझे नहीं पता कि उसने हर महीने अपने तीन हजार कटवाए हैं। खन्ना की दुकान पर दस के बजाए वह साढ़े ग्यारह बजे जाता था, रोज पूरे एक घंटे तक मेरी मालिश करता था। बहुत ही अच्छा और नेक लड़का है, मैंने तो और भी बहुत कुछ सोचा था, लेकिन उसने ही मुझे बताया कि तुम्हारी कोई दोस्त है सीमा, जिससे तुम प्यार करते हो। यार, ये जवानी की उम्र दोबारा नहीं आती। तुम अपने दोस्त की दोस्ती को नहीं समझ सकते। उसने तुम्हारे लिए, तुम्हारी मोहब्बत को समय मिल सके, इसलिए मुझे ठीक किया है। ऐसे दोस्त बहुत मुश्किल से मिलते हैं। अब दुकान का काम मैंअच्छी तरह से देख सकता हूँ। तुम्हें भी थोड़ी आजादी मिल जाएगी, और मैं भी मयंक के अहसान से मुक्ति पा लूंगा।” बाबूजी ने कहा।

” लेकिन उस साले ने तो मुझे कुछ बताया ही नहीं कि वह मेरे ही घर में रोज आता है।”

“यही तो उसकी दोस्ती है, और इंसानियत है। उस ने मुझे भी बताने से मना कर रखा था। आज उसे एक नहीं दो-दो सरप्राइज देने की जरूरत है। अब तुम मुझे बताओ कि तुमने अभी उसे साला कहा, लेकिन तुम्हारी तो अपनी पसंद है। क्या तुम सोनी की शादी मयंक के साथ करने को तैयार हो? मयंक का तो कोई लफड़ा नहीं है?” बाबू जी ने पूछा।

“मयंक का तो कोई लफड़ा नहीं है, लेकिन सोनी के साथ उसकी शादी कैसे हो सकती है? आप तो कहते थे कि सोनी की शादी किसी बड़े घर में करेंगे।” मृदुल ने कहा।

“बस इतना ही काफी है, तुम्हें नहीं पता…. बेटा ! घर बड़ा हो या न हो, लेकिन आदमी बड़ा होना चाहिए। हमारे पास पैसे भी थे, लेकिन मैं बीमार था। उसने अपनी जेब से पैसे खर्च करके और मेहनत करके मुझे ठीक किया है, जो आदमी दिल से अमीर होता है, उससे बड़ा अमीर कोई नहीं होता। मेरा तजुर्बा कहता है कि तुम्हारी बहन भी उसके साथ खुश रहेगी, और इस दोस्ती को मजबूत करते हुए रिश्ते में बदल ही जाना चाहिए।” बाबू जी ने मृदुल के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।

“इसका मतलब यह हुआ कि अब वह मुझे सचमुच साला कह सकता है… अब मैं उसका सर्टिफाइड साला हो जाऊंगा।” मृदुल के ऐसा कहते ही माँ के चेहरे पर मुस्कान आ गई थी और उसकी बहन सोनी शर्माते हुए अंदर चली गई थी, जो कि इस बात की गवाही थी कि रिश्ता मंजूर है।

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