चर्चा में

क्रन्तिकारी लखेदन गुरु का हिसाब

व्यंग्य

संजय दुबे ( वरिष्ठ पत्रकार )

लखेदन गुरु ग़ज़बे हैं। जहां सुई न जाय तलवार घुसेड़ देंगे और तलवार की जगह तुरपन वाली सुई। उम्र महज़ 65
साल। प्रामाणिक।आधिकारिक 75 साल। प्रामाणिक और आधिकारिक में अंतर क्यूं हैं? मत पूछिए।ये फ़र्क,सरकारी है। ज़ो अवश्यसंभावी है। सरकारी काम है।कर्मचारी दवाब में रहते है,हमेशा। हुआ दरअसल ये कि ज़ब आधार बना तो गुरु दो चार साल नहीं बनवाये।अपनी समाजवादी अकड़ और मोहल्ले के लड़कों के चलते। ज़ब कई योजनाओं में आधार की जरुरत आन पड़ी मसलन,बैंक खाता, राशन कार्ड,लोकतंत्र रक्षक पेंशन के चलते तब मजबूरन इनको आधार बनवाना पड़ा। आधार वाले ने इनसे इनकी जन्मतिथि पूछी, कहे -जेठ पूर्णिमा 1939। सपोर्ट में इनका टीएन शेषन वाला वोटर कार्ड लगा। जिस पर जन्म वर्ष था 1949। तबसे गुरु की प्रामाणिक और आधिकारिक जन्मतिथि में दो पंचवर्षीय योजना, अब, दस साल का अंतर लगातार चला आ रहा है। गुरु!इमरजेंसी में जेल गये थे। अपने को भगत सिंह बताते हैं और तत्कालीन कांग्रेस सरकार को ‘तर्ज – ए -ब्रिटिश हुकूमत।’ लौंडे सारे मुहल्ले के उनको चिलम फूंकने के बाद छेड़ देते हैं -“गुरु! कैसे दिल्ली की सरकार को बुक किये रहें, बताओ, ज़रा। ” लखेदन गुरु चालू। पैनासोनिक टेपरेकॉर्डर सरीखे- इहाँ लुकाये, उहाँ भागे। सरकार पीछे, हम आगे। खेत, खलिहान, बाग, नदी, पहाड़, शहर, जंगल। सबका पर्यटन किये। धरा गये सादात स्टेशन पर।

समाजवादी बेल्ट के चलते चेकिंग तगड़ी थी। जीआरपी दरोगा पहचानते थे। कई बार नेतागिरी उनसे झाड़ चुके थे। उसने मौका देखकर बदला ले लिया। इनको कर दिया 10 महीने के लिए भीतर। चुनाव घोषित होने पर बाहर निकले। ये मूलतः सरकार विरोधी हैं। बचपन से ही क्रन्तिकारी रहें हैं । जैसा कि स्वयं बताते है। पिता ज़ी इनको पढ़ाना चाहते थे। ये, सिर्फ़ खेलना और घूमना। स्कूल से घर शिकायत पहुंची कि लखेदन सुकुल कई दिन से स्कूल नहीं आ रहे है। घर वालों ने स्कूल के लड़कों के साथ दीना तिवारी के गन्ने के खेत में इनको धरा। साथ में एक अदद बुश रेडियो, ताश की गड्डी, खैनी और कुछ रेजगारी, इनके तीन और दोस्तों के साथ। लखेदन गुरु काफ़ी प्रतिभाशाली हैं । किससे कौन सा काम लेना है? इन्हें इसकी छुटपन से बढ़िया समझ है। शुरू से ही इनके सम्पर्क सूत्र सीआईए सरीखे थे। मुखबिरी करने वाले लड़कों का पता लगा कर उनकी अच्छी खातिर की। इसके बदले में गुरुज़ी ने इनको जमकर धोया। उसी जबरदस्त धुलाई के दौरान इन्होंने आत्मरक्षार्थ ( जैसा कि ये बताते है, बाक़ी मानते है कि ये झूठ है ) अपनी पटरी से गुरूजी पर एक ही वार उनके सर पर किया पर कद में इनके छोटा होने के कारण गुरूजी के कंधे पर वार लगा। जिससे गुरूजी तिलमिला उठें। इन्हें गरियाते हुए पीटना छोड़ दिए। इस दिन के बाद लखेदन गुरु स्कूल से नाता तोड़ पूर्णतः सामाजिक हो गये। मरना, जीना, शादी, पंचायत, विवाद शुरू और समाप्त,निर्विकार भाव से हर जगह सशरीर उपस्थित रहते हैं। घर बसाने से लेकर उजाड़ने तक में माहिर हैं। मियां बीबी को खाट से ही नहीं घर से भी अलग करने का हुनर इनके पास है । जिसके चलते सारा शहर ही नहीं दस – बीस कोस के लोग इनको जानते हैं। राजनीति तो ओढ़ना बिछाना है। षड्यंत्र,इष्ट मित्र।सोशलिस्ट पार्टी,जनता पार्टी,जनता दल, जनता दल (यू )समाजवादी जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी उस सभी पार्टी में रहे जिसमें समाजवादी शब्द जुड़ा रहा।
गुरु! अपने को मोदी से बड़ा फक्कड़ बताते है। कहते है-” ऊ कहते है-‘ झोला उठाएंगे और चल देंगे। ‘ ऊ! ज़ब जायेंगे तब देखेंगे कि झोला लेके गये कि खाली? इहाँ तो लखेदन गुरु खाली देह लेकर कहीं जाते है। बोरा मिला तो भला,नहीं मिला ? अति सुंदर। खाली तख्त ? शानदार, ज़बरदस्त। ”
भोजन? सर्वहारा। आमिष, निरामिष सब खा लेंगे। वैचारिक रूप से भी वही हैं। आजकल के नये छात्र सर्वहारा विचार से परिचित भी नहीं हैं। है भी तो नगण्य। सरंक्षित सरीखे है। प्रायः दिल्ली में ही दिखते है। वहीं के छात्र इनको जानते हैं। बाक़ी देश के छात्र इनसे अनजान ही हैं। बीती लगन नवंबर में गांव के एक लड़के का इन्होंने घर बसाया। घर वाली बिहार की। दूल्हा यूपी का। बारात गाज़ीपुर से बाया बक्सर बिहार जानी थी। बिहार में शराबबंदी, और बारात बिना नागिन डांस, भोजपुरी गाना के कैसे निकलती ? लिहाजा नवयुवक मंगल दल और ग्राम निर्माण समिति के वरिष्ठ सदस्यों ने सर्व सम्मति से निर्णय लिया कि बारात यूपी से ही “फ्रेश” होकर बिहार में दाखिल होगी। बारात स्कार्पियो,इनोवा, बस से चली। नवयुवक मंगल दल ने लखेदन गुरु को अपने साथ लेकर स्कार्पियो में बैठा लिया।आगे। ड्राइवर के बगल में।काहे कि गुरु,चिलम फूकतें है सोमरस नहीं छकते। नवयुवक दल यूपी से फ्रेश हो जैसे ही बिहार सीमा में दाखिल हुये पुल पर बिहार पुलिस ने इनकी गाड़ी रोक ली। सबके मुँह में एक मशीन लगा दी। सबसे मशीन पास हो लखेदन गुरु के मुँह के पास जाकर रुक गयी। दरोगा ने कहा – ‘नीचे उतरिये। दारू पिए है। फाइन दीजिये। पांच सौ। गुरु! आव देखें न ताव। पाजामे से बाहर। आंख दम की वज़ह से लाल होकर बड़ी हो चुकी थी। क्रांतिकारी आत्मा सजग हो उठी। इन्हें दरोगा आपातकाल वाला नज़र आने लगा। पीछे से नवयुवक कहने लगे – समाजवादियों की ये दुर्दशा? वो भी शरद यादव,लालू यादव के साथी गुरु के साथ। वो भी बिहार में।लानत है नीतिशे सरकार पर। अब, लखेदन गुरु को आ गया गुस्सा। गाड़ी से उतर दरोगाज़ी से उलझ गए। हाथा पाई हुई। गुरु गये थाने पर। कन्या पक्ष को पता चला तो वो लोग आकर छुड़ा कर ले गये। फ़िर रात को नवयुवक मंगल दल के एक सदस्य ने अचानक से जोर से हुंकार भर कहा -” आज़ लखेदन गुरु से हुआ इंतकाम पूरा। ” जेल जाता तो कल हनुमानजी को इग्यारह नारियल चढ़ाता। बाराती सब अवाक कि गुरु को ये लड़का क्यों जेल भेजना चाहता है? दारू के नशे में धुत युवक गा रहा है -“थोड़ी सी जो पी ली है……..नशा शराब में जो होती तो नाचती बोतल……. जैसी करनी वैसी भरनी……… जैसा करम करेगा वैसा फल देगा भगवान………। ”
लखेदन गुरु शांत भाव से संत सरीखे उसकी बात सुनी। फ़िर दिमाग़ लगा कर बड़े प्यार से पूछा -” बाबू! दरोगा ज़ी को केतना पैसा दिए थे? मुझको फंसाने के लिए?”
लड़का बोला -” एक हज़ार। ” ए भी जान लो गुरु! तुमको हम भिजवाते ‘ करोड़ी बंगला ‘(जेल )पर लड़की वालों का रसूख जरा ज्यादा निकला। नहीं तो आज़ तुमसे हिसाब हो जाता बराबर। तुमने हमको, हमरी पत्नी से अलग करवा दिया। तलाक का मुकदमा लड़ रहे है हम। बसा घर उजाड़ दिया।सोचें थे कि तुमको भी मुकदमा लड़वा देंगे। उहों बिहार में। पर चलो गुरू! हिसाब रहा बाक़ी। भूल चूक लेनी देनी। समय के फेरा के इंतज़ार करिये।

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