लद्युकथा : सार्थक
@ रश्मि लहर…
“क्यों भाभी! ये जो तरह-तरह के आदमी तुम्हारी कविताओं को सुनकर वाह-वाह करते हैं , उन्हे खुश रखने के लिए तुम क्या-क्या प्रयास करती हो ?”
सार्थक ने एक अश्लील हँसी के साथ अपनी विधवा भाभी रेनू से पूछा।
कोई उत्तर न पाकर वो फिर बोला-
“दद्दा तो संत आदमी थे तभी मैं यहाँ कभी आता नहीं था पर आज सोचा अपनी भौजाई से मिलता चलूँ।”
कहते हुए सार्थक रेनू की तरफ बढ़ा …
“शट अप ! वहीं रूक जाइए, निकल जाइए मेरे घर से।”
कहते हुए रेनू ने अपनी बारह वर्षीय बेटी की तरफ चिन्तित निगाहों से देखा।
सार्थक वहीं ठिठक कर बोला-
“बिटिया भी माँ पर गई है , मोबाइल पर लगी है तबसे। वैसे आपके शहर की लड़कियां हैं बड़ी पटाखा भाभी।”
कहते हुए सार्थक ने बेसिन में पान थूका और रेनू की बेटी की तरफ बढ़ा।
तब तक कालबेल बजी।दरवाजा खुला ही था कि एक महिला पुलिस इंस्पेक्टर और चार महिला सिपाही दनदनाती हुई भीतर घुसीं ।
बिटिया ने इशारा करते हुए कहा,
“गिरफ्तार कर लीजिए इनको, ये ही है सार्थक! मैं कोमल! मैंने ही सेक्सुयल हरासमेन्ट की ऑनलाइन शिकायत दर्ज करवाई है इंस्पेक्टर!”
“अरे बिटिया! मैं तो तुम्हारे बाप जैसा हूँ ।”
कहते हुए सार्थक अपने हाथों की हथकड़ियाँ देखकर चीख पड़ा।
रश्मि लहर
इक्षुपुरी कालोनी,
लखनऊ -२, उत्तर प्रदेश

