“साहित्य के बाज़ार के बीच ग़ज़ल कुंभ एक आंदोलन” — सिद्धेश्वर
पटना। यूट्यूब और फेसबुक पर प्रसारित साहित्यिक–सांस्कृतिक कार्यक्रम ‘सिद्धेश्वर की डायरी’ के 49वें एपिसोड में साहित्यकार सिद्धेश्वर ने ग़ज़ल कुंभ को साहित्य के बढ़ते बाज़ारूकरण के विरुद्ध एक सशक्त और वैचारिक आंदोलन बताया। उन्होंने कहा कि वरिष्ठ शायर दीक्षित दनकौरी पिछले सत्रह वर्षों से बिना किसी शुल्क, सिफ़ारिश या भेदभाव के देश–विदेश के नए और वरिष्ठ रचनाकारों को समान मंच उपलब्ध करा रहे हैं, जो समकालीन साहित्यिक परिदृश्य में एक अनुकरणीय पहल है।
सिद्धेश्वर ने जानकारी दी कि 11–12 जनवरी 2026 को काशी स्थित पटेल भवन में आयोजित ग़ज़ल कुंभ में लगभग 300 शायरों ने 300 से अधिक ग़ज़लों की प्रस्तुति दी। इस आयोजन की विशेषता यह रही कि सभी प्रतिभागियों को बराबरी का अवसर मिला। कार्यक्रम के दौरान पुस्तक समीक्षा, साहित्यिक भेंटवार्ता, कविता पाठ तथा सिद्धेश्वर की लघुकथा ‘नेपथ्य का सच’ का भी प्रभावी पाठ प्रस्तुत किया गया।
एपिसोड के अंतर्गत विज्ञान व्रत, विनोद कुमार राज, विद्रोही, आरती रानी, पल्लवी, सीमा रानी सहित अनेक कलाकारों की कृतियाँ ऑनलाइन कला-प्रदर्शनी में प्रदर्शित की गईं, जिनकी वरिष्ठ कलाकार मुरारी मधुकर ने सराहना की। युवा साहित्यकार धनंजय कुमार ने कविता पाठ करते हुए कार्यक्रम को नए और वरिष्ठ रचनाकारों—दोनों के लिए उपयोगी बताया तथा इसकी नियमित प्रस्तुति का सुझाव दिया।
कार्यक्रम ‘सिद्धेश्वर की डायरी’ साहित्यिक संस्कृति का एक प्रभावी, लोकप्रिय और जन-सरोकारों से जुड़ा मंच बनता जा रहा है, जो रचनात्मक अभिव्यक्ति को व्यापक दर्शकवर्ग तक पहुँचा रहा है।

