पुण्य स्मरण

आलोचना समालोचना से बेफिक्र पंडित हरिशंकर तिवारी अपनी राह चलते रहे।

@ यशोदा श्रीवास्तव…

संस्मरण…

पंडित हरिशंकर तिवारी! यूपी के कोने कोने तक यह नाम किसी शिनाख्त का मोहताज नहीं रहा! मेरठ, गाजियाबाद, गाजीपुर, बलिया और फिर संपूर्ण राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र तक गोरखपुर और फिर पूर्वांचल वाले तिवारी जी का नाम फैला हुआ था। पूर्वांचल में ब्राह्मणों में खासा लोकप्रिय पंडित जी की जीवन बहुआयामी रहा। पंडित जी की वजह से ही गोरखपुर बीबीसी की खबरों की सुर्खियां रहा। जब वे राजनीति में सक्रिय हुए तो मीडिया में खबरों की हेडिंग बनी “राजनीति में माफिया का रंग “!


आलोचना समालोचना से बेफिक्र पंडित जी अपनी राह चलते रहे। जब पहली बार चिल्लूपार से विधायक बने तो हर शाम धर्मशाला में पंडित जी का हाता पत्रकारों के घंटा दो घंटा बैठकी का अड्डा हो गया। यहां पिटकू मिश्र और गणेश शंकर पाण्डेय जी पत्रकारों का खयाल रखते थे। बड़ी सी थाली में भिगोया हुआ चना और एक बड़ी गिलास में दूध जरूर परोसा जाता था। राजनीति में आने के बाद पंडित जी का माफिया नाम खबरों की हेडिंग होती थी। यह पंडित जी को पसंद नहीं था। वे खुद या गणेश जी अखबार के संपादक को फोन कर बड़ी विनम्रता से इस पर आपत्ति जताते थे। कभी क्रोधित नहीं हुए। वे किस श्रेणी के माफिया थे इसे मैं नहीं जान पाया लेकिन उनकी राजनीतिक समझ ने मुझे बड़ी सीख दी।
एक दिन मैं हाता में पंडित जी से मिलने गया। तब वीर बहादुर जी यूपी के सीएम थे। किसी बात को लेकर पंडित जी ने उनकी आलोचना शुरू कर दी। उसी को आधार बनाकर मैंने दिल्ली प्रेस की पत्रिका भू भारती में ” एक नाकाबिल मुख्यमंत्री के बने रहने का राज”शीर्षक से स्टोरी छाप दी। पत्रिका के बाजार में आने के बाद,किसी ने एक प्रति उन तक पहुंचा दिया। इसी बीच एक दिन फिर उनसे मुलाकात हुई। उन्होंने पत्रिका में छपी लेख पर नाराजगी जताई। उनकी नाराजगी हेडिंग से थी। उन्होंने कहा,एक मुख्यमंत्री के लिए ऐसी हेडिंग क्या सही है? हमारी या हमारे जैसे तमाम लोगों की उनसे वैचारिक मतभेद हो सकता है लेकिन हम उन्हें नाकाबिल कहने वाले कौन होते हैं! मैंने कहा, ये हेडिंग प्रेस से लगी है, हेडिंग वही लोग लगाते हैं। उन्होंने मुझसे दिल्ली प्रेस के संपादक/मालिक परेश नाथ का नंबर लिया और तुरंत फोन मिलाकर बात की। उनसे भी इस हेडिंग पर आपत्ति जताई। कहा कि पत्रकारिता का यह घटियापन है कि वह एक मुख्यमंत्री की खबर पर ऐसी हेडिंग लगाता है।।
इस बात का जिक्र इसलिए करना पड़ा क्योंकि गोरखपुर में ठाकुर ब्राम्हणों में खिंची तलवारों के बीच पंडित जी का एक पक्ष यह भी है कि वे सम्मान के मानक का खयाल सदैव ही रखते थे।
पंडित हरिशंकर तिवारी क्या थे, कैसे थे इस पर बहस के बजाय एक सच यह भी है कि जो भी जरूरत मंद मदद को उनके पास गया,वह निराश नहीं हुआ। हाते से उसकी मदद जरूर हुई। पंडित जी का न रहना एक युग के अंत जैसा है। “युग” को आप चाहें तो अपने अपने ढंग से परिभाषित कर सकते हैं।।
मृत्यु लोक पर भरपूर जीवन जीकर गोलोकवासी हुए पंडित जी को विनम्र श्रद्धांजलि।।।

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