मज़बूर-क़लम
( ओमा The अक्© )
“प्रेमचंद! अच्छा हुआ तुम मर गए..!
तुमने बस डॉ•चड्ढा की अंग्रेजियत देखी थी
आज के “ब्रांडेड-हस्पताल” नहीं देख सके/
तुम बस निर्मला पर हुए अत्याचार देख कर मर गए
“उन्नाव” और “कठुआ” नही देख सके/
तुम “ग़बन” के मज़बूर नायक को समझ सके
नए भगोड़े-रईसों को नहीं/
तुम दो-बैलों की दुर्दशा के गवाह बन सके
सरकारी उपेक्षा से क़त्ल हुए किसानों की नहीं/
तुम पोंगा-पण्डित की धूर्तता बता गए,
समाज-सुधारकों की धूर्तता देख न सके/
तुम “नमक के दरोगा” से उम्मीद लगाए थे
और बूढ़े भगत के जीने की दुआ माँग रहे थे/
मग़र वो बूढ़ा-भगत तो तुम्हारे जाने के कुछ दशकों के भीतर ही मर गया,
और छोड़ गया उन ज़हरीले साँपों को,
जिनको कभी पकड़ कर वो गाँव ले जाता था
ताकी शहर जी सके/
अब सब तरफ ज़हर ही ज़हर है
अच्छा हुआ तुम मर गए!
देख लो, आज वो लोग
तुम्हे कलम का सिपाही कह कर श्रदांजलि दे रहे हैं
जो लोग आज हर चलती कलम तोड़ देना चाहते हैं…
ऐ शब्दों के जादूगर!
तुम जो लिख रहे थे
उसको जी रहे थे
हम जो जी रहे हैं
उसे लिख भी नहीं सकते..!!
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