खास-मेहमान

यही उनका नसीब है, कि वें ‘गरीब’ हैं

(मंगलेश पाण्डेय ‘हर्ष’)

एक रात को साहब आए
और बोले
“घबराइए मत
आज के बाद
आपको अपने घर में ही रहना है”

आजादी के बाद का भारत
तीन हिस्सों में इसलिए बंट गया
क्योंकि प्रधानमंत्री पद को लेकर
विवाद हो गया था

उस समय भी दंगे में
मारा गया गरीब
पैदल चला गरीब
भूखा मरा गरीब

एक दौर बीता
फिर एक ‘लौह महिला’ आई
उसने ‘इमरजेंसी’ लगाई और
‘प्रभावशाली नेत्री’ कहलाई

उस ‘आपात’ में भी
लाठी खाया गरीब
जेल गया गरीब
भूखा मरा गरीब
जिंदगी को तड़पता
देखता रह गया गरीब

देश में एक दौर आया
प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री
छह छह महीने पर
बदल जा रहे थे

और इस दौरान होने वाली
असुविधा में भी
भूखा सोया गरीब
मरा सिर्फ और सिर्फ गरीब

उम्मीदों का बोझ लेकर सिर पर
देश का भला करने वाले नेता ने
रात को घोषणा की
‘नोटबंदी’

और कहा “घबराइए मत”
सिर्फ पचास दिन
लाइन में लग जाइए
और नोट बदलवाइए

पचास दिन में भी
लाइन में लगा रहा गरीब
भूखा सोया गरीब और
लाइन में लगे लगे मरा गरीब

और आज जब महामारी में
साहब की फिर से घोषणा हुई है
कि घर में बंद रहो
सारी सुविधाएं बंद की जाती हैं

तब भी
पैदल चल रहा है गरीब
भूखा मर रहा है गरीब
खून के आंसू रो रहा है गरीब

इसके बावजूद इनमें
इतनी ताकत आ जाती है
क्योंकि ये मान लेते हैं
कि यही उनका नसीब है

कि वें ‘गरीब’ हैं

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *