कोई लिख रहा होता है, आला दर्ज़े की एक कविता

मान बहादुर सिंह “मानु”…
गरीब हर दोपहर
सूरज को सुलगाकर
जला लेते है . . . .
अपनी -अपनी बीड़ियाँ
और लाद लेते है आग को
अपने पीठ और पेट पर …
औरते हर दोपहर
चूल्हे में झोंक देती है
अपने आप को . . .
तब शराबी पति और
भूखे बच्चों को खिलाती है
दो जून की रोटी …..
तभी राजधानी के
चिल्ड कमरे में बैठकर
तितलियों के रंग और
पहले प्रेम पत्र विषयक
निक्षेपित विषय पर
कोई लिख रहा होता है
आला दर्ज़े की एक कविता।

