मित्रता दिवस पर मान बहादुर सिंह “मानु” की रचना

( मान बहादुर सिंह “मानु” )
पैसे कम थे
पर, दोस्त मेरे
ज्यादा थे ……..
वो तंग कमरा
तब कायनात लगता था
भरी कापियाँ
पड़ी किताबे ….
सच !बातचीत करती थी
तब रुलाते नही
सारे रोते थे _
दुःख में सुधा चन्दर के
चर्चा मार्क्स की
सीख गांधी की ….
घंटो ईश्वर की तब
मुख़ालफ़त किया करते थे //
खाली जेब थी
सारी खुशियों थी
तनके चलते थे
सारे दोस्त सड़को पर
ज़मीन अपनी थी
आशमान अपना था
गिलास खाली थी
पर पीते सभी ज्यादा थे //
भरा गिलास है
रंगा लिहाफ है
ताकते रहते है
बेरंग स्याह पर्दो को
मैं सोया हूँ यादों की
ओढ़ चादर को ………..

