“पहले और अब”

( किशोर कुमार धनावत )
पहले,
जब कभी अकेला होता था,
खुद को खोजता रहता था।
जिंदगी की परेशानीयों को,
अकेला भोगता रहता था।
रखता था हिम्मत कायम,
दु:खों को टोकता रहता था।
जब जाता नहीं था बेमुरव्वत,
कीलों को ठोकता रहता था।
अब,
हंसता हूँ और हंसाते रहता हूँ,
चाहे जो हो हाथ मिलाते रहता हूँ।
नफरत को आजाद कर दिया,
और अपने को आबाद कर लिया।
अरे दोस्तों ये तुम्हारा काम है,
किया तुम सबने मेरा तो नाम है।
लेखक – किशोर कुमार धनावत, रायपुर
२-९-२०२१

