रचनाकार

लद्युकथा : सीख

शब्द मसीहा केदारनाथ…

पोता काफी समय से डिग्री लेकर भी घर में बैठा था। पिता अक्सर उसे डाँटते, ताना मारते कि तुम्हें ही नौकरी क्यों नहीं मिलती ? बाकी भी तो लोग काम कर रहे हैं। मगर वह यह भी जानता था कि अगर कम पैसों की नौकरी की तो भी पिता तुलना तो जरूर करेंगे। धीरे-धीरे कर उसके मन में कुंठा भरने लगी।

दादा जी उसके व्यवहार को लेकर बहुत चिंतित होते। पिता-पुत्र के बीच की तकरार कभी अच्छी नहीं होती, इस बात को दादा जी बहुत अच्छी तरह जानते थे। दादा घर के दरवाजे के सामने अपने मूढ़े पर बैठे थे कि तभी एक बच्चा मुस्कुराता, दौड़ता अपने गुब्बारे के साथ घर में आ गया। दादा जी ने स्नेह से उसके सिर पर हाथ फिराया और फिर गुब्बारे को देखते हुए अपने पोते को पुकारा – “बेटा! प्रवीण , जरा इधर तो आ ।”

पोता उनकी आवाज सुनकर उनके पास आया और बोला- “दादा जी ! बताइये क्या काम है ?”

“इस गुब्बारे को ध्यान से देखो।”

“इसमें क्या खास है दादा जी ?”

“तुम्हें कुछ खास नहीं दिखाई देता क्या ? फिर से सोचो । बताओ गुब्बारे को क्या चीज ऊंचाई तक ले जाती है?” दादा जी ने पूछा।

“दादा जी ! इसके अंदर जो हवा है वही इसको ऊपर तक ले जाती है।” पोते ने जवाब दिया ।

“गौर करो , जो इस गुब्बारे के बाहर हवा है , वह इसे इधर -उधर ले जा सकती है, मगर उड़ते हुए गुब्बारे को ऊंचाई इसके अंदर की हवा ही देती है। तुम्हारे अंदर शिक्षा है, तुम चाहो तो बिना किसी बाहरी सहारे के भी उड़ सकते हो। अपने हुनर को अपने लिए आजमाओ ….काम शुरू करने के लिए तुम्हें मैं पैसा दूँगा बेटा ।” दादा जी ने कहा।

“मैं समझ गया दादा जी।” पोता बोला।

“क्या समझे बेटा ?”

“यही कि अब भटकना बंद , अपनी अंदर की ताकत से ऊंचाई छूना है। मुझे पैसे नहीं आशीर्वाद दीजिये, मैं ट्रेक्टर मेकेनिक के हेल्पर का काम करने की हामी भर आया हूँ, कल से ही काम शुरू करूंगा। हाथ साफ हो जाएगा तो आपसे मदद लूँगा। मेरी मेहनत मुझे गुब्बारे की तरह ऊपर ले जाएगी और वो मेरे भीतर आपने वो सीख जगा दी है।” पोता मुस्कुुराते हुए पैर छूकर बाहर निकल गया।

दादा जी बच्चे की मस्ती में डूब गए जो गुब्बारे को ऊपर उड़ते देख किलकारियाँ मार रहा था।

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