पुण्य स्मरण

कबीर के अन्दर बेहतर बदलाव के लिए आवश्यक नैतिक साहस और चरित्र था

( मनोज कुमार सिंह )

“कबीरा खड़ा बाजार में लिए लुआठी हाथ,
जो घर फूंके आपना चले हमारे साथ” प्रायः सरसरी नजर से महात्मा कबीर की इन पंक्तियों का शाब्दिक अर्थ निगमित करने वाले कबीर को तोड़-फोड की प्रवृत्ति वाला विध्वंसक रचनाकार मानते थे। परन्तु उपरोक्त पंक्तियों और कबीर की अन्य रचनाओं का सूक्ष्मता अवलोकन करें तो स्पष्ट परिलक्षित होता है कि-कबीर अपने दौर के उन गिने-चुने रचनाकारों में हैं जिनके अन्दर बेहतर बदलाव के लिए आवश्यक नैतिक साहस और चरित्र था। वह शासन सत्ता की तलवारो से निर्भिक होकर अवैज्ञानिक, अमानवीय अतार्किक, और प्रगतिविरोधी सडी-गली मान्यताओं, धारणाओं परम्पराओं, रूढियों और रीति रिवाजों को खुल कर चुनौती देते हैं। जो निश्चित रूप से कबीर को सच्चे क्रांतिकारी की परम्परा ला कर खड़ा कर देता है। क्योंकि एक सच्चा क्रांतिकारी वही होता है जो अपने दौर की सडी गली परम्पराओं रीति रिवाजों और व्यवस्थाओं को जड मूल से मिटाकर बेहतर समाज बनाने का प्रयास करता है। क्रांतिदृष्टा कबीर ने यही किया उन्होंने अपने दौर की उन प्रथाओं, परम्पराओं और मान्यताओं पर सचेतन वैज्ञानिक और तार्किक प्रहार किया जिन प्रथाओं,परम्पराओं और मान्यताओं पर झाड-झंखाड लगा हुआ था। कबीर का प्रहार महज विध्वंसक के लिए नहीं था बल्कि बेहतर सृजन और रचना के लिए था।
कबीर उपरोक्त पंक्तियों के माध्यम से उस घर को फूंकने की बात नहीं करते हैं जो ईट गारे और संगमरमर से बना है बल्कि उस मानव मन और हृदय रूपी घर को फूंकने की बात करते हैं जिसमें दया करूणा परोपकार और मानवता निवास करने के बजाय ईर्ष्या द्वेष कलह डाह लोभ क्रोध ने स्थायी रूप से आवास बना लिया है। प्रकारांतर से कबीर उस घर को फूंकने की बात करते जिसमें ईर्ष्या द्वेष कलह डाह लोभ क्रोध स्वार्थ रहते। इनको जड-मूल से समाप्त कर ही मनुष्य के हृदय को दया करूणा परोपकार ममता और परमार्थ से परिपूर्ण किया जा सकता है। जब मनुष्य का हृदय दया करूणा परोपकार ममता समता और परमार्थ के भाव से लबालब भर जाता हैं तभी मानवीय मूल्यों पर आधारित स्वस्थ्य समरस और सहिष्णु समाज बनाया जा सकता है।

(मनोज कुमार सिंह)

वस्तुतः कबीर मध्ययुगीन संक्रमणकालीन दौर के संत और रचनाकार थे। संक्रमण के इस दौर में मनुष्य एक दूसरे से डरा और सहमा हुआ एक दूसरे पर विश्वास का संकट था और चारों तरफ हिंसा-प्रतिहिंसा का वातावरण था। सामंतीय प्रवृत्ति और सुविधाभोगी वर्ग द्वारा जनता के शोषण के लिए नये-नये हथकण्डे अपनाए जा रहे थे। इस दिशा में शिष्टाचार के नाम पर अंधविश्वास अंधभक्ति और परोसा जा रहा था। इसके साथ ही साथ ढोंग-पाखंड का दायरा भी बढता जा रहा था। ऐसी परिस्थिति में कबीर जनमानस में अपने विचारों द्वारा मानवीय मूल्यों को बचाने के लिए श्लाघनीय प्रयास करते हुए दिखाई देते हैं। संक्रमण के इस दौर में मनुष्य को बौद्धिक तार्किक और वैज्ञानिक चेतना से परिपूर्ण बनाने के प्रयास के लिए सर्वदा स्मरण किया जायेगा। कबीर अनूठे समाज सुधारक के साथ साथ उत्कट क्रांतिकारी थे ।

लेखक – मनोज कुमार सिंह बापू स्मारक इंटर कांलेज दरगाह मऊ में प्रवक्ता हैं।

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