रचनाकार

ग़ज़ल : चला कब्र में सोने वादा तुम्हारा, बचा क्या बताओ इरादा तुम्हारा

@ हरिलाल राजभर

चला कब्र में सोने वादा तुम्हारा
बचा क्या बताओ इरादा तुम्हारा

किये जाते हो खूब मौकापरस्ती
न है ज़ुल्म ये क्या ज़ियादा तुम्हारा

गरीबों की बस्ती का ख़ुद्दार हुँ मैं
न समझो हूँ मैं कोई प्यादा तुम्हारा

जहां भर के पर्दे से ढँक लो बदन पर
न चेह्रा ढँकेगा लबादा तुम्हारा

मुहब्बत दिया मैनें तुमने की नफरत
अब आया है कैसा तगादा तुम्हारा

जवां जिस्म से मापो दुनिया पर इक दिन
सिकुड़ जाएगा ये कुशादा तुम्हारा

पसीना न निकले गरीबों का गर तो
सिमट जाएगा इस्तिफ़ादा तुम्हारा

गरीबों को लूटे हो अपनों की खातिर
न विष क्या बनेगा इफ़ादा तुम्हारा

लगा जिसके लब से हो ‘हरिलाल’ बोतल
पियेगा वो क्यूँ आब सादा तुम्हारा

कुचहरा, बिजपुरा, मऊ, उ० प्र०

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