12वीं पास लेखक के द्वारा लिखित साहित्य पर होती है चर्चा व रिसर्च
काम मोची का! साहित्य के लेखक और यूनिवर्सिटी में देते हैं लेक्चर
कहते हैं न साहित्य दुनिया की वह सबसे खूबसूरत विद्या है जिसके सहारे मनुष्य को वह पहचान मिलती है कि उससे, छोटे काम छोटे व बड़े काम बड़े नज़र नहीं आते। बल्कि साहित्य, लेखन, शब्द का सृजन उस व्यक्तित्व के जीवन में ऐसा निखार लाता है कि उसके शब्दों की जादूगरी उसके खुद की अभिव्यक्ति की गूंज दूर तलक सुनाई देती है।
तभी तो मेरा देश भारत ऐसे महान विभूतियों से भरा है जिसके आगे नतमस्तक होकर भी सिर ऊँचा होता है हृदय गौरवान्वित होता है।
आइए आपको बताते हैं एक ऐसी शख़्सियत के बारे में जो पंजाब राज्य के चंडीगढ़ में टांडा रोड के समीप सुभाष नगर मुहल्ले में रहते हैं। साधारण से दिखने वाले, 75 की उम्र व मात्र कक्षा 12वीं पास द्वारका भारती दिखने और रोजमर्रा के काम में सिर्फ़ साधारण हैं वास्तव में वे असाधारण व्यक्तित्व और विशाल प्रतिभा के विनम्र व्यक्ति हैं। आपका पेशा तो मोची का है जो वे सिर्फ़ जीविकोपार्जन के लिए यह काम करते हैं। लेकिन अपने जीवन के सुकून के लिए साहित्य लिखते हैं, उसी को रचते हैं, उसी में रमते हैं और उसी में बसते हैं। महज 12वीं पास लेकिन साहित्य की समझ के कारण उन्हें वर्दीवालों को लेक्चर देने बुलाया जाता है। कई साहित्यकार इनकी पुस्तकों को अन्य भाषाओं में अनुवाद कर चुके हैं। इनकी स्वयं की लिखी कविता “एकलव्य” Indira Gandhi Open university इग्नू में Post Graduate एमए के बच्चे पढ़ते हैं, वहीं पंजाब विश्वविद्यालय में 2 होस्टल इनके उपन्यास मोची पर रिसर्च कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जो व्यवसाय आपका भरण पोषण करे, वह इतना अधम हो ही नहीं सकता, जिसे करने में आपको शर्मिंदगी महसूस होगी।
साहित्यकार द्वारका कहते हैं घर चलाने को जूते गांठता हूँ, अपने सुकून के लिए साहित्य रचता हूँ! आप पंजाब के चंढीगढ़ के सुभाष नगर में प्रवेश करेंगे तो एक छोटी सी दुकान पर आज भी द्वारका भारती हाथों से नए-नए जूते तैयार करते हुए मिल जाएँगे। इतना ही नहीं अक्सर उनकी दुकान में साहित्य प्रेमी अधिकारियों और साहित्यकारों की पहुंचना और साहित्य पर चर्चा करना दिन का हिस्सा हैं। चर्चा के दौरान भी वह अपने काम से जी नहीं चुराते और पूरे मनोयोग से जूते बनाते रहते हैं। फुरसत के पलों में भारती दर्शन और कार्ल मार्क्स के अलावा पश्चिमी व लैटिन अमेरिकी साहित्य का अध्ययन करते हैं।
द्वारका भारती कहते हैं कि 12 वीं तक पढ़ाई करने के बाद 1983 में होशियारपुर लौटे, तो वह अपने पुश्तैनी पेशे जूते गांठने में जुट गए। बचपन से ही साहित्य में लगाव था। वे डॉ.सुरेन्द्र अज्ञात की क्रांतिकारी लेखनी से प्रभावित होकर उपन्यास जूठन का पंजाबी भाषा में अनुवाद किए। उपन्यास को पहले ही साल बेस्ट सेलर उपन्यास का खिताब मिला। इसके बाद पंजाबी उपन्यास मशालची का अनुवाद किया गया। इस दौरान दलित दर्शन, हिंदुत्व के दुर्ग पुस्तक लेखन के साथ ही हंस, दिनमान, वागर्थ, शब्द के अलावा कविता, कहानी व निबंध भी लिखे।
द्वारका भारती ने बताया कि आज भी समाज में बर्तन धोने और जूते तैयार करने वाले मोची के काम को लोग हीनता की दृष्टि से देखते हैं, जो नकारात्मक सोच को दर्शाता है। आदमी को उसका पेशा नहीं बल्कि उसका कर्म महान बनाता है। वह घर चलाने के लिए जूते तैयार करते हैं, वहीं मानसिक खुराक व सुकून के लिए साहित्य की रचना करते हैं। जूते गांठना हमारा पेशा है। इसी से मेरा घर व मेरा परिवार का भरण पोषण होता है।
ऐसे कर्मयोगी को हमारा सादर नमन है।


