कोई न कोई वजह ढूंढ निकालना, मिल बैठकर हंसने हंसाने का…

शब्द मेरे मीत…
डा. महिमा सिंह
कुछ पास और आए, जब भी हम मिले,
धूम मचाए भूले, सारे शिकवे गिले।
खूब सजते, आई लाइनर, लाजवाब आउटफिट,
मैचिंग इयररिंग्स, बैंगल्स, पर्स,
और मनभावन लिपस्टिक,
देती हम सब सखियों के, रूप में चार चांद,
मगर रौनक तो तब आती, जब हम सब,
मिल बैठकर खिलखिलाते संग साथ-साथ।
आओ भरले इन खुशियों को,
अपनी-अपनी झोली में,
जाने कब किस गली में साथ छूट जाए।
हम इसी शहर में रह जाएं,
जाने तुम कौन से शहर पहुंच जाओ।
याद तो बहुत आओगे, न भूलेगे ना ही भूलने देंगे।
मिलेंगे, मिलेंगे का वादा लेकर तुम को
विदा करेंगे दोस्तों।
नए शहर की खुशियां, तुम्हें खूब मुबारक।
वहां भी चहचहाना और खुशियां बिखेरना।
कभी फैशन, कभी क्रिसमस, कभी अनारकली,
कभी टपोरी, कभी सावन, तो कभी हल्दी कुमकुम,
तो कभी स्माइली तो कभी ट्विन फ्रेंड्स,
तो कभी ब्राइडल थीम,
कोई न कोई वजह ढूंढ निकालना,
मिल बैठकर हंसने हंसाने का।
पार्टी के रंग में, सब मिलकर रंग जाने का।
थोड़ी शरारत, थोड़ी मस्ती, ढेर सारा धमाल,
मचाते-मचाते, कभी-कभी थोड़ा सा बवाल।
कभी चाय ढोकला खस्ता तो कभी चाइनीज़,
तो कभी राजस्थानी थाली भरपूर स्वाद लेते रहना,
स्वादिष्ट व्यंजनों का, अपनी खूबसूरत सी मुस्कुराहटों के साथ।
दोस्ती के इंद्रधनुषी रंगों में समय कब,
पंख लगा के उड़ जाता हम यह जान ना पाते,
लेते सेल्फी अनेक बनती रील सुपर कूल,
स्लो मोशन के अपने ठाठ नहीं उसका कोई जवाब नहीं।
कभी अंताक्षरी कभी डम शरार, कभी मस्त खेल,
मचा जाते हैं गुदगुदी बना देती है महफिल को खास,
दोस्तों तुम सब की मौजूदगी तो चलो फिर,
मिलने का वादा करके विदा लेते हैं,
आज की शाम से अपना ख्याल रखना,
दोस्ती के लिए और अपने अपनों के लिए।

