डा०लीना ने अपने जीवन के बीस बरस आजमगढ़ की नई प्रतिभाओं को तराशने में खपा दिया

■ बीस बरस बाद आज़मगढ़ को अब अलविदा कहने जा रहीं हैं यह कलाकार

■ रामकथा पर आधारित चित्रकला विश्वरिकॉर्ड में शामिल

■ कल आजमगढ़ में उनकी आखिरी चित्र प्रदर्शनी थी

@ अरविंद सिंह एक रिपोर्ट
इतवार का दिन आमतौर पर घर के लिए आरक्षित होता है. बहुत से रूके गृहकार्य और रचनात्मक कार्य निपटाएं जातें. उसी क्रम में लगा ही था कि- मोबाईल पर घंटी बजी. उठाया, उधर से डा०लीना मिश्रा थीं- ‘भैय्या ! आज आजमगढ़ में हमारी आखरी चित्र प्रदर्शनी है 7 बजे शाम को खत्म हो जाएगी, आप जरुर आएं.’ दूसरे अवसर होते तो शायद नहीं जाता, लेकिन जब यह शब्द सुना कि ‘आजमगढ़ में यह आखिरी प्रदर्शनी है..’, तो मन जैसे धक! से कर गया. जैसे आज़मगढ़ से कोई अपना अब बाहर चला जाएगा. जी हाँ, आप ठीक समझे, डॉ लीना मिश्रा आज़मगढ़ की उन नव शिल्पियों में हैं, जो अपने जीवन का 20 बरस आजमगढ़ को बनाने, संवारने और कला का शऊर सिखाने में, नई पीढ़ी को तराशने में ख़पा दिया, अब उनके जीवन साथी और हम लोगो के मित्र डॉ०कौशलेन्द्र मिश्र का बाराबंकी स्थानांतरण हो जाने के कारण नैयर- ए- आज़म की सरज़मीं से दाना- पानी उठ जाने वाला है. यह एक भावनात्मक लगाव था और है, इस मादरे वतन से, जो लीना ने जीया है. दो दशक पहले आज़मगढ़ से जो रिश्ता इस दंपत्ति का बना, वह किसी अपने रक्त संबंधों से ज्यादा मजबूत, याराना और अपनापन लिए हो गया .
हालांकि, मेरी डा०लीना मिश्रा से कुल दो या तीन मुलाकाते हीं हैं, लेकिन उनकी कला से लगता है सदियों का रिश्ता है.
कहते हैं न- फ़न और मन को सीमाएं नहीं बांध पाती हैं, वह तो निर्मुक्त आकाश में आज़ाद पक्षी की तरह विचरण करती हैं. बंदिशों और सरहदों को भी लांघ जातीं हैं. लीना तो बस हिन्दुस्तान के हृदय प्रदेश- मध्य प्रदेश से हैं, जिनकी शिक्षा-दीक्षा कला क्षेत्र में होती है. चित्रकला से इतनी दिवानगी कि उसमें रंगों के अदभुत प्रयोग में ही पीएचडी तक कर लिया और खलीलाबाद के डा० कौशलेन्द्र मिश्र के जीवन में फ़नकार बनकर उतर आयीं.


कौशलेन्द्र जब आजमगढ़ के मालतारी डिग्री कालेज में बीस बरस पहले बतौर प्रध्यापक आएं.
लीना ने बीस बरस पहले आजमगढ़ के हरिऔध नगर कालोनी में ‘फाइन आर्ट सेन्टर’ की स्थापना कर तुलिका और कैनवास पकड़ आजमगढ़ के मानस को गढ़ने लगीं. ऐसी गढ़ी कि देखते ही देखते- इस कस्बाई नगर से कला के नई कोपलें फूंटने लगीं और आधी आबादी ने लीना में उस फ़नकार को देखा, जो उसके लिए गुरूता के भार तले दबा नहीं था बल्कि अपना दोस्त नज़र आया. फिर क्या कार्यशालाएं चलने लगीं- चित्र प्रदर्शनी लगने लगीं, धीरे लोगो का मन- मिज़ाज कलात्मक और कला अनुरागी हो गया. वैसे आज़मी कला के पारखी पहले से रहे हैं. यही कारण है कि- गुजरात के कच्छ से पाटरी उद्योग निजामाबाद में आया. और यह ब्लैक पाटरी के लिए दुनिया में जाना जाता है.
कल जब हम इस प्रदर्शनी पहुंचे तो हमारे साथ जर्नलिस्ट क्लब के अध्यक्ष आशुतोष द्विवेदी, वरिष्ठ पत्रकार वेदप्रकाश सिंह लल्ला भी थें. बल्कि हमने इन दोनों सुधीर जनों को चलने का निवेदन किया. शाम के कोई 6 बजे थें. हमारी गाड़ी नगर के हृदय प्रदेश में स्थित अग्रसेन महिला पीजी कालेज के प्रागंण में जा रूकी. गाड़ी स्वयं चीफ साब( द्विवेदी जी- जब हमारे ब्यूरो चीफ थे, तो इसी नाम से प्राय: पुकारते थें) चला रहे थे.
प्रदर्शनी सभागार के मुख्य द्वार पर एक बड़ा बोर्ड लगा था-
World Records India: Lokabhiramam ( Longest Ramkath folk Painting in Indian mythology by women artists groups)
जी, भावार्थ यह है कि- भारतीय लोक चित्रकला शैली में रामकथा को प्रर्दशित करने वाली महिला कलाकारों का समूह- जिसने इसके लिए विश्वरिकॉर्ड बनाया है. इसका नाम है- ‘लोकाभिरामं’.


अन्दर बड़े प्रशाल में अदभुत, अविस्मरणीय और अकल्पनीय रामकथा की चित्रकला दिख रही थी. गणेश वंदना से प्रारंभ होकर- राजा राम की सरयू में जल समाधि तक का दृश्य. इसके बीच पूरी रामकथा की यात्रा कुल 53 महिला कलाकारों और लड़कियों ने बनाएं हैं, जो 260 फीट लंबी है. यह पेंटिंग लगभग सभी भारतीय परंपरागत शैलियों में निर्मित हैं. बिहार की मधुबनी शैली, से लेकर राजस्थान पटटी शैली और फड़ शैली, केरल की शैली तक का विधिवत और सधा काम दिख रहा है. हर पेंटिंग पर उसके कलाकर का नाम, शैली, और रामकथा वृतांत लिखा है, और उसकी व्याख्या करने के लिए स्वयं वह कलाकार उपस्थित हैं. इनके इसी काम को लेकर इस समूह की 53 प्रतिभागियों को वर्ल्ड रिकॉर्ड प्रमाण पत्र मिला है जो आज ही इनको वितरित किया गया है. सभी हर्षित हैं,प्रसन्न हैं.
‌सचमुच यह कला का अदभुत प्रदर्शन है. कलाकारों की साधना और तपस्या उनके कामों बोलता है. यहाँ भी बोल रहा है. सबके केन्द्र में है लीना और उनकी बीस बरस की तपस्या. जो विश्वरिकॉर्ड के रूप में नई पहचान के साथ आजमगढ़ के हिस्से आयी है. इसके लिए वे आजमगढ़ को धन्यवाद देती है. इस शहर की शुक्र गुजार होती है. आज़मगढ़ को लगता है कि उसकी लीना की आजमगढ़ में यह आखिर प्रर्दशन है. उसके बाद वह लखनऊ बाराबंकी चली जाएगीं. लेकिन मुझे लगता है जो मान और अपनापन आजमगढ़ ने लीना को दिया और लीना ने आजमगढ़ को वह एक अदृश्य बंधन है, जो कभी विछड़ नहीं सकता. वह हमेशा जुड़ा रहेगा, आजमगढ़ की स्मृतियों में, यहाँ के कलाकारों के कलाओं में वह निखर कर आ ही जाएगा. अब तो लीना ने जो परिवेश बनाया है, उससे इस कला कद्रदान बढ़े हैं. अब तो विश्वविद्यालय में भी बीएफए और एमएफए जैसे पाठ्यक्रम चलेगा.
‌लीना आप आजमगढ़ से जा रही हैं, आजमगढ़ की स्मृतियों और आत्मा ने आप को आत्मसात कर लिया है.वह कभी छूटेगा नहीं, न ई जिम्मेदारियाँ और नयें मंजिलों के अशेष शुभकामनाएं!!

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