समाज में शतत् सफाई की जरूरत, अब प्रश्न उठता है कि समाज के सफाई की जिम्मेदारी किसकी है?

( डा. गंगा सागर सिंह ”विनोद”)
अच्छे एवं बुरे लोग इस पृथ्वी पर सृष्टि के आरम्भ से आज तक हमेशा रहे हैं और आगे भी रहेंगे लेकिन उनकी संख्या का अनुपात हर युग में अलग अलग रहा है। अच्छे लोगों का प्रतिशत सत् युग में ज्यादा एवं बुरे लोगों का कलियुग में ज्यादा रहता है। समाज की तुलना एक घर से किया जा सकता है। जैसे आप घर में ताला लगाकर चले जाये, तो जब कुछ दिन बाद लौटने पर आप अपने घर को गंदा पाते हैं। जब आप घर पर रहते थे तो प्रतिदिन घर की सफाई किया करते थे जिससे घर स्वच्छ रहता था। उसी तरह समाज में शतत् सफाई की जरूरत है। अब प्रश्न उठता है कि समाज के सफाई की जिम्मेदारी किसकी है? यह प्रश्न बहुत ही कठिन है। यह संपूर्ण समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है कि शतत् समाज की सफाई करते रहें तथा सही रास्ते से भटके लोगों को सही रास्ते पर लाने की कोशिश करते रहें। अब प्रश्न उठता है कि शतत् समाज सफाई अर्थात् समाज सुधार को कौन नेतृत्व देगा? राजनीतिज्ञ?? कतई नहीं। हमारे सभ्यता एवं संस्कृति में ऋषि- मुनी शिक्षा देने एवं समाज सुधार सम्बन्धित नियमों को प्रतिपादित करते थे एवं राजा-महाराजा की जिम्मेदारी होती थी कि उसका अनुपालन सुनिश्चित करें। आज लोक तंत्र है, समाज सुधार की जिम्मेदारी कई लोगों को बांट दी गई है। पहला संसद सदस्य जो संसद में, दूसरा विधायक विधानसभा में नये नये कानून बनाते हैं संसोधन की जिम्मेदारी निभाते हैं। दूसरा प्रशासन जो संसद से बने कानून को धरातल पर उतारते हैं। तीसरा न्याय पालिका जो सच्चाई उगलवाने के बाद दोषी व्यक्ति को दंडित करने का आदेश प्रदान कर फिर प्रशासन से अनुपालन करवाता है। संसद (शासन), प्रशासन एवं न्याय पालिका की तिकड़ी का एक चेन है। इस चेन की एक भी लड़ी टूटते ही समाज में असामाजिक तत्वों का बोलबाला एवं उनकी जी-हजूरी करते समाज का प्रदूषण निश्चित है। जब से संचार माध्यमों का विकास हुआ तबसे मीडिया की भूमिका समाज सुधार में स्थापित हो गयी है। इसे लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ की संज्ञा दी गई है। मीडिया का मुख्य कार्य समाज सुधार के संदर्भ में शासन, प्रशासन, न्याय पालिका एवं समाज को आइना दिखाना है। लेकिन बड़े दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि निष्पक्ष पत्रकारिता करने वालों की संख्या बहुत कम हो गयी है।जब राजतंत्र था उस समय हर राज दरबार में भांट हुआ करते थे जो हमेशा राजा का गुणगान किया करते थे। वैसे ही लोकतंत्र में राजनीतिक पार्टियां अपने अपने भांट रख ली हैं या उन्हें परिस्थितवश खरीद लेती हैं। समय समय पर इस पृथ्वी पर समाज सुधारकों का जन्म अनादिकाल से होता रहा है जो प्रभावशाली ढंग से समाज सुधार किये। समाज सुधारकों ने समाज सुधार “वैचारिक क्रान्ति “के माध्यम से ही हमेशा किया। समाज सुधार का प्रयास, हिंसक- क्रान्तियों के माध्यम से इतिहास में मिलता है जिसे “संपूर्ण क्रान्ति” कहा गया। लेकिन ये क्रान्तियाँ केवल शासक बदलने तक सीमित रह गईं और ध्रुव सत्य है कि उन क्रान्तियों ने केवल तानाशाहों को पैदा किया। तानाशाही ने आम जन को कष्ट ही दिया। अतः हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि “वैचारिक क्रान्ति” ही समाज सुधार का सबसे सशक्त माध्यम है जिसे आधुनिक युग में “सोशल-मीडिया” के माध्यम से आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। लेकिन यंत्रवत दूसरे के विचारों को बिना “आत्म- सात्” किए फारवर्ड करने को वैचारिक क्रान्ति का दर्जा कतई नहीं दिया जा सकता है। अच्छे विचारों वाली पोस्ट पर चिन्तन- मनन के बाद अपने विचार लिखें या अपने कुछ विचार उस पोस्ट पर लिख कर ही फारवर्ड करें। हमारे देश में अनादिकाल से साधू-संतों का देश रहा है।इन्ही साधू संतो की समाज सुधार की जिम्मेदारी रही है।हर वर्ग के आज भी अपने अपने धर्म गुरू हैं और बकायदे क्षेत्र बटा है। आज भी धर्म गुरूओं का समाज में बहुत गहरी पैठ है। अधिकांश लोग गुरूमंत्र लेते हैं जिसे आम भाषा में “गुरुमुख” होना कहते हैं। लेकिन आज कल गुरुमुख होना एक परंम्परा बनकर रह गई है।गुरूमंत्र को आत्मसात करते बहुत कम लोग दिखते हैं। अंततः इस ग्रूप के सभी सदस्यों से प्रार्थना है कि “समाज- सुधार” पर अपने मौलिक विचार प्रस्तुत करने का कष्ट करें।
जय हिंद।




