अलविदा भाजपा! भरत भैया नांव पर सवार होकर मधुबन की वैतरणी में हिलोरे ला दिए

@ आनन्द कुमार…
मऊ। जिस मल्लाह के सहारे राम नदी पार कर सबरी के जुठे बैर खाएं थे, आज उसी जनकपुरी (बिहार) के मल्लाह की पार्टी के सहारे अयोध्या क्षेत्र के भरत नदी के किनारे बसे मधुबन की जनता से अपना राजनैतिक नैया पार लगाने की अपील करने के साथ विधानसभा 2022 के चुनावी समय में कूद गए हैं।
गजब का संयोग है रामराज्य की सरकार में भरत ने अपने लिए अपने मेहनत का फल मांगा और उन्हें नहीं मिला और उससे आहत होकर उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया।
खैर उन्हें दर्द भी हुआ होगा, जिस दल के लिए उन्होंने अपनी जिन्दगी के तन, मन व धन को उसे सींचने और जनता की सेवा में लगा दिया, अयोध्या में राम जन्मभूमि के लिए सिर पर खड़ाऊं रखकर भगवान राम के मंदिर निर्माण के लिए बिन चप्पल पगडंडी-पगडंडी पर चला, एक दिन अचानक उन्हें एक राम की वजह से अलविदा भाजपा कहना पड़ेगा।
खैर हर राम, राम नहीं होते जो अपने भरत के लिए एक पल में सबकुछ त्याग दे। क्योंकि भरत को जिस राम ने ठेस पहुंचाई वे अचानक जाति की रसूख पर सवार होकर राजनीति के वैतरणी में गोता लगा लिए। लेकिन भाजपा के राजनीति के विद्वतजन यह भूल गए कि मधुबन के जनाधार में बिन भरत कोई राह आसान नहीं है। और अगर यकिन करें तो अब हुआ भी वही, घाघरा के मझधार में भाजपा की नांव बुरी तरह से फंसती नजर आ रही है। और भगवान राम के जनकपुर क्षेत्र की विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष बिहार सरकार के कैबिनेट मंत्री मुकेश साहनी की पार्टी के सहारे भरत भैया नांव पर सवार होकर मधुबन की वैतरणी में हिलोरे ला दिए हैं। हारना जीतना तो अलग बात है, लेकिन रामायण में भगवान राम के सबसे प्रिय मल्लाह जाति व मधुबन में अपनों के सहारे भरत भैया ने रामराज्य की स्थापना की बात करने वाले भाजपा के प्रत्याशी के सामने राजनीति की सियासत में एक छोटी चाल के सहारे, राजनीति का मंझा खिलाड़ी होने का संकेत दे दिया है। वह भी वीआईपी पार्टी बिहार में भाजपा व जदयू की सहयोगी दल के रूप में सत्ता में आसीन है।
अब किसकी नांव डोलेगी, किसकी नांव हिचकोले लेगी और किसकी नईया पार लगेगी यह तो बाद में तय होगा। भरत भैया ने अपने अलविदा भाजपा के पत्र में भाजपा प्रत्याशी रामविलास चौहान पर सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे बिहार के यूनिवर्सिटी के घोटाले का जिक्र कर यह संदेश भी दे दिया है कि वे इस बात को जनता की चौखट तक ले जाएंगे। ऐसे में अगर हालात यही रहा तो राम, भरत और भाजपा की लड़ाई में कहीं तीसरा बाजी न मारी ले जाए यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा।



