बेटे का फ़र्ज़
करीब पन्द्रह साल से वह घर में काम करती थी . मालकिन का बेटा विदेश से लौट रहा था . घर में ख़ुशी का माहौल था .
“बीबी जी ! हम बाबा के लिए ये छोटा सा गिफ्ट लेकर आई है . आप के बहुत बड़े-बड़े लोग इधर आ रहे हैं . हम आपका इज्जत के वास्ते सामने नहीं आयेगी पर आप ये गिफ्ट जरुर दे देना . वो हमको एक बार भी याद किया तो हम हम खुश हो जायेगी .” और उसने कुछ गुलाबों का गुलदस्ता आगे कर दिया .
“चंदा ! मैं उसे जरुर दूँगी तेरा गिफ्ट . देख तू जरुर आना शाम को . कोई कुछ नहीं कहेगा . खाना मत बनाना तू , तेरे अकेली के खाने से कोई कम थोड़े ही पड़ेगा . तू घर में रहेगी तो मुझे भी सहारा रहेगा.” मालकिन बोली .
“नहीं , मैं नहीं आयेगी . आज शाम खाना भी नहीं खायेगी . बाबा के वास्ते मैं व्रत रखा है . कल सुबह ही खाना खायेगी .”
“अच्छा ….तो ये ले …कुछ खाने के लिए ले लेना .” मालकिन ने दो सौ रुपये आगे कर दिये .
शाम को बेटा आया तो खूब पार्टी हुई . लोगों ने उसका जमकर स्वागत किया . रात करीब एक बजे तक सब लोग जब चले गये तब बेटे ने पूछा -‘माँ ! क्या चंदा माँ अब नहीं आती ? कहीं दिखाई ही नहीं दी .”
“ओह ! बेटा मैं भूल ही गई . तेरी चंदा माँ ने तेरे लिए गिफ्ट दिया था .” माँ ने फ्रीज खोला और एक गुलदस्ता उसके हाथों में सौंप दिया .
“सबसे पहला गिफ्ट चंदा का ही है तेरे लिए . जानता है, तेरे लिए उसने व्रत भी रखा है . मैंने उसे बहुत कहा , पर चंदा मानी ही नहीं . कह रही थी कि उसकी नजर न लग जाय …हा हा हा .” माँ बोली .
“माँ ! मुझे सुबह जल्दी जगाना . मैं चंदा माँ के आने से पहले उसके घर जाना चाहता हूँ . अभी तो चंदा माँ सो रही होंगी .” बेटा बोला और सोने के लिए चला गया .
नींद अच्छे से आई नहीं . सुबह पाँच बजे ही कपड़े बदले और बाहर निकल लिया . कई गलियों से गुजरता और पूछता हुआ एक घर के सामने पहुँचा और दरवाजा खटखटाया .
“आती हूँ . जरा सा इंतज़ार करो .” दरवाजा खुला तो सामने एक सजीला नौजवान खड़ा था .
“चंदा माँ ! मैं विवेक .”
“ओ ! साईं ….ये क्या किया तू . मेरा दिन आज बहुत अच्छा है . मेरा खोली पर मेरा बाबा आया है . आओ ….अंदर आ जाओ . मेरा खोली बहुत छोटा है . तुम इधर बैठो . मैं चाय बनाती है .”
“आज गले लगाकर माथा नहीं चुमोगी चंदा माँ ?” विवेक बोला .
“अरे! अब तू बड़ा हो गया है . तू इधर आया है , मैं बहुत खुश है .” चंदा ने उसे गले लगाया और स्नेह से उसके सिर पर हाथ रखा और फिर माता चूम लिया . विवेक बैठ गया और चंदा चाय बनाने लगी .
“चंदा माँ ! मम्मी कितना पैसा देती है अभी ?”
“पाँच हजार देती हैं . मालकिन बहुत अच्छी हैं . आजकल इतनी अच्छी मालकिन कहाँ मिलती है . मेरी तो उम्र निकल गई सेवा करते .”
“ये घर आपका है ?”
“अरे! बेटा मेरी किस्मत में घर कहाँ ? अकेली के लिए ये बहुत हैं . अब कितने दिन और जीना है मुझे . मर रहूंगी किसी रोज . तुझे देखने की बहुत इच्छा थी पर डरती थी मैं .” और उसने चाय का कप आगे कर दिया .
“तुम्हारी चाय कहाँ है चंदा माँ ?”
“मैं तो साईं को भोग लगा के ही चाय पीउंगी .”
चाय पीकर विवेक घर चला गया . चंदा माँ इंतज़ार करती रही पर विवेक घर में नहीं था . दोपहर में विवेक घर आया और चंदा माँ को गले से लगाया .
“चंदा माँ ! मुझे सूरन की सब्जी खिला सकती हो ?”
“शाम को बनाऊँगी . अभी तो तेरी पसन्द का गाजर का परांठा बनाया पर वो भी ठंडा हो गया . तुम कहाँ चले गये थे ? मैं कब से इंतज़ार कर रही थी .”
“एक बहुत जरुरी काम करना था सो बाहर चला गया . तुम मेरा इंतज़ार करते थक गई होगी . आओ मैं घर तक छोड़ देता हूँ गाड़ी से .”
“हा हा हा …मजाक करता है . मेरा घर तक गाड़ी नहीं जाती . मैं चली
जायेगी .”
” माँ ! चंदा माँ कहना नहीं मान रही है . इसे नौकरी से निकाल दो .” विवेक ने आवाज लगाईं .
“क्या हुआ रे ! क्यों निकाल रहा है चंदा माँ को ?” माँ बोली .
“ये मेरा कहना नहीं मानती . मैं गाड़ी से छोड़ने को कह रहा हूँ तो मेरे साथ चलती ही नहीं है .”
“चंदा ! बात मान ले इसकी . मैं भी साथ चल रही हूँ .” और माँ ने चंदा का हाथ पकड़ उसे गाड़ी में बैठा दिया . गाड़ी चल पड़ी . मगर ये चंदा के घर का रास्ता नहीं था .
“आओ ! बाहर आओ चंदा माँ . तुम्हारा घर आ गया .” विवेक बोला .
“मेरा घर इधर नहीं है . ये कहाँ ले आए मुझे ?”
विवेक ने हाथ पकड़ा और एक दरवाजे के सामने रुक कर उसका ताला खोला . अंदर जरुरत की हर चीज रखी थी.
“ये लो चंदा माँ . ये घर आज से आपका है . इसका कोई किराया नहीं और तुम इसकी मालकिन हो .” विवेक ने चाबी हाथ में रखते हुए कहा . माँ भी हैरानी से उसे देख रही थी .
“तुम ये क्या किया बाबा तुमने ?”
“तेरे साईं नाथ ने ही मुझे कहा कि चंदा माँ भी अब बूढी हो रही . उसे आराम की जरुरत है .” विवेक बोला .
“तू मजाक क्यों करता है मुझ गरीब से .” चंदा माँ ने आँखों से आँसू छलकाते हुए कहा .
“मजाक नहीं है ये . ये एक बेटे का फ़र्ज़ है . अब शाम को सूरन की सब्जी खाने आऊँगा . “
दो दो माँ इस बेटे को नई रौशनी से चमकता देख रहीं थीं झोली भर दुआओं के साथ .
शब्द मसीहा

