शोक संदेश

आजमगढ़ के वयोवृद्ध पत्रकार बनवारी लाल जालान नहीं रहें!

@ डा०अरविंद कुमार सिंह

यह खबर आजमगढ़ के बौद्धिक समाज, खास कर पत्रकारिता और सामाजिक व राजनीतिक लोगों को भीतर तक आहत कर देने वाली है।
अब वे स्मृतिशेष हो गयें। आज ही लखनऊ में दोपहर बाद अपने पुत्र के आवास पर अंतिम सांस ली।वे जीयनपुर के मूल निवासी थें, तीन भाईयों में सबसे बडे थें। आजमगढ के हरबंशपुर मोहल्ला में रहते हैं।
हमारे समय में जालान जी अपने दौर की पत्रकारिता के आखिरी स्तंभों में से एक थें। जिस दौर में वे पत्रकारिता के पथ का चयन किया वह दौर साठ का दशक था, संभवत: 1968 में सार्वजनिक रूप से जनहित के लिए कलम उठाई।
पत्रकार बनने से पहले वे युथ कांग्रेस से जुडे और आजमगढ के अध्यक्ष थे। पूर्व केंद्रीय मंत्री और इंदिरा के बेहद निकट रहे चन्द्रजीत यादव से उनके गहरे रिश्ते थें। पत्रकारीय जीवन की शुरुआत उन्होंने वाराणसी से प्रकाशित ‘आज’ अखबार से की। उनकी रिपोर्टिंग और लेखन क्षमता अद्भुत थी। अपने तेवर और कलेवर के लिए सदैव लोकप्रिय रहें। बाद में अंग्रेजी अखबार हिन्दुस्तान टाइम्स से जुडे। उन्होंने देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को बनते बिगडते देखा । अपनी कलम से गांव,गरीब, किसान और व्यापारियों की समस्याएं उठाएं। इन पंक्तियों के लेखक से भी संबंध पत्रकारिता की वजह से ही जुडे। शार्प रिपोर्टर के अनेक अंकों में उनके राजनीतिक और सामाजिक विचारों को प्रकाशित करने का अवसर मिला।
पहली बार मेरे आदर्श सोशलिस्ट विनोद भैय्या ने जब शार्प रिपोर्टर का पहला अंक मार्च 2008 में उन्हें भेंट किया तो जो प्रतिक्रिया आयी वह बहुत अच्छी नहीं थी, उन्होंने विनोद भैय्या से कहा-”यह आजमगढ की तेरहवीं पत्रिका है, 13वीं मतलब समझ रहें न..?”
विनोद भैय्या ने तपाक से जवाब दिया, जालान जी!
जिसकी छट्ठी-बरही होती है, उसकी 13वीं भी होती। शायद इस जवाब के लिए वे तैयार नहीं थें, लेकिन विनोद भैय्या का नैतिक बल और विराट व्यक्तित्व के आगे अच्छे-अच्छे शांत हो जाते थें।
यह संस्मरण विनोद भैय्या प्राय: सुनाते थें। बाद में आदरणीय जालान जी खुद शार्प रिपोर्टर के लिए लेख भेजते और हम छापते रहें।1988 में नगर पालिका परिषद आजमगढ का भी चुनाव लडे। उनके चुनाव निशान गौरैया की चर्चा काफी रही प्राय: नारा लगता था-
बनवारी जालान.
गौरैया निशान!
इस चुनाव में बारह सौ वोट मिला था।
कई बार जब सक्रिय पत्रकारिता छोड कर चौक स्थित अपनी दुकान पर मिलते तो बडी आत्मीयता से चाय पिलाते। इधर काफी दिनों से हालचाल नहीं मिल पा रही थी। शायद वे अपने पुत्र के यहां लखनऊ निवास कर रहें थें। 82 बरस की उम्र थी। काफी दिनों से इलाज चल रहा था। आज दोपहर बाद हंसा अकेला ही उड़ गया…
इस फानी दुनिया को छोड़कर वे अनंत की यात्रा पर निकल गयें। बची तो बस उनकी मधुर स्मृतियां
जालान जी को आखिर प्रणाम! उनकी आत्मा को ईश्वर अपने चरणों में स्थान दें। नमन!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *