अब कौन करेगा, नौजवानों, छात्रों, मजदूरों की बात!
@ सुदर्शन कुमार/आनन्द कुमार
घोसी। भारतीय साम्यवादी आंदोलन में अपने संघर्षों एवं जुझारू तेवर से देश और दुनिया मे पहचान बनाने वाले कामरेड अतुल कुमार अनजान का शुक्रवार की भोर में करीब 4 बजे लखनऊ के एक अस्पताल में निधन हो गया। वे काफ़ी दिनों से बीमार चल रहे थे। छात्र जीवन से ही सक्रिय राजनीति में पदार्पण करने वाले श्री अनजान वर्तमान में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय सचिव और देश के सबसे बड़े किसान संगठन अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय महासचिव थे। निधन से देश ही नहीं विदेशों में लोग स्तब्ध हैं, लोगों ने कहाँ कि अनजान का यूँ जाना व्यथित कर दिया।
किसान आंदोलन में रहे प्रमुख, झुकना पड़ा पीएम मोदी को!
अनजान देश में लगातार देश व किसानहित में संघर्ष करते रहे। देश के किसानों के हित की रक्षा के लिये भारत सरकार द्वारा गठित स्वामीनाथन समिति के सदस्य के रूप में उन्होंने किसानों के हित मे बहुत सारे उपाय सुझाया। इसी समिति की रिपोर्ट को लागू कराने के लिए पिछले दिनों देशभर में बहुत बड़ा किसान आंदोलन चलाया गया। इस आंदोलन की पृष्ठभूमि श्री अनजान ने ही देश के समस्त किसान संगठनों को लामबंद कर तैयार किया।
इस ऐतिहासिक किसान आंदोलन ने केंद्र की पूर्ण बहुमत की सरकार को अपने ही बनाये गये कानून को वापस लेने पर मजबूर कर दिया। देश की मोदी सरकार के खिलाफ चलाए जा रहे किसान आंदोलन को उन्होंने हर स्तर पर समर्थन दिया था। वे इस दौरान कहीं भी रहे हों लेकिन वे किसान आंदोलन पर सीधी नज़र और वहाँ की हर खबर रखते थे। प्रधानमंत्री मोदी तक को किसान आन्दोलन के मुद्दे पर झुकने को मजबूर किया।
अनजान का सफ़र…
29 नवम्बर 1949 को पैदा हुए अतुल कुमार अनजान के पिता डॉ अयोध्या प्रसाद सिंह जाने माने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। काकोरी कांड में उनका नाम प्रमुखता से लिया जाता है। इनकी माताजी का नाम प्रमिला सिंह है। वर्तमान में माता और पिता दोनों लोगों का निधन हो चुका है। लखनऊ में श्री अनजान के पिताजी प्रसिद्ध चिकित्सक थे और उनका चिकित्सालय तथा घर दोनों ही आजादी के आंदोलन के सेनानियों के अड्डा हुआ करता था। इस परिवेश में पले पढ़े श्री अनजान लखनऊ विश्वविद्यालय से 1967 से लेकर 1983 तक स्नातक, परास्नातक, एलएलबी, एलएलएम आदि की पढ़ाई की। वे बिहार के बाँका क्षेत्र के रहने बाले थे। उन्होंने कई बार देश के अलावा विदेशों में भी विभिन्न मुद्दों पर हिस्सा लेकर अपनी बात रखी है । लखनऊ के एक अस्पताल में 03 मई को वह अपने अपनों को अलविदा कह गए!
छात्र राजनीति के लिए श्री अनजान लखनऊ विश्वविद्यालय में सदियों तक जाने जाएँगे…
इस दौरान वह लखनऊ छात्र संघ के लगातार सात वर्षों तक अध्यक्ष रहे। प्रदेश की राजधानी के सबसे बड़े विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक लम्बे समय तक अध्यक्ष होने के कारण श्री अनजान को पूरे देश के विश्वविद्यालयों के छात्र संघ के अध्यक्षों ने अपना अध्यक्ष चुन लिया और वह पूरे देश के विश्वविद्यालयों में छात्रों के हितों के लिये संघर्ष करते रहे। वह लम्बे समय तक आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन एआईएसएफ के भी आल इंडिया अध्यक्ष और महासचिव रहे। छात्र राजनीति के लिए श्री अनजान का यह कार्यकाल सदियों तक जाना जाएगा।
अखिल भारतीय किसान सभा से जुड़कर किसान हित के लिए संघर्ष किया…
सहजानन्द सरस्वती की बनाई अखिल भारतीय किसान सभा से जुड़कर देशभर के किसानों को लामबन्द कर किसान हित के लिए संघर्ष में जुट गये। फिर क्या था उन्होंने किसान, मज़दूर व नौजवानों की लड़ाई लड़ना ही अपना जुनून बना लिया।
संसद का सपना रह गया अधूरा…
देश की संसदीय व्यवस्था में गहरी रुचि होने तथा संसद में मुखरता के साथ किसान, नौजवान की आवाज बुलंद करने के उद्देश्य से श्री अनजान घोसी लोकसभा क्षेत्र से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से 1999, 2004, 2009, 2014 तथा 2019 में चुनाव लड़े। दुर्भाग्यवश उन्हें हर बार हार का मुंह देखना पड़ा।
लाल सलाम का नहीं छोड़ा साथ, नहीं तो कब हो गए होते सांसद!
अतुल कुमार सिंह अनजान संसद में जाकर किसानों नौजवानों छात्रों मज़दूरों की आवाज़ तो बनना चाहते थे, लेकिन बार-बार कम्युनिस्ट पार्टी के लाल झंडे के बैनर के तले जनता से मिली हार के वावजूद भी उन्होंने कभी भी दल बदलने की कोशिश नहीं की। वे घोसी की सियासत में अंतिम साँस तक ईमानदार छवि को लेकर मौत को गले लगा लिये, लेकिन कभी भी किसी ने सुझाव भी दिया कि दल बदल कर सांसद बन जाए तो उन्होंने उस सुझाव को एक सिरे से ख़ारिज कर दिया और कहा की राजनीति का जो चाल चरित्र है उसी हिसाब का अगर मैं हो जाऊँ तो, फिर औरों में और अनजान में क्या फ़र्क है।
संसद तो नहीं पंहुच पाए, जेल ज़रूर गए…
अतुल कुमार अंजान का संसद में जनता का प्रतिनिधित्व करने का सपना, धरा का धरा रह गए, लेकिन अनजान उत्तर प्रदेश के फेमस पुलिस-पीएसी विद्रोह के प्रमुख नेताओं में से एक थे। अंजान अपने राजनीतिक करियर के सफर में लगभग 57 माह जेल में बंद रहे।
संघर्ष करने का जुनून पिता से मिला विरासत में…
अपने पिता डॉ एपी सिंह जो अनुभवी स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्होंने हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन की गतिविधियों में शामिल रहे, इसके लिए उनके पिता को अंग्रेजों ने जेल में डाल दिया था। जुझारू तेवर और आम जनता के हक़ हुकूक की लड़ाई लड़ने का जज़्बा उन्हें अपने परिवार में सीखने को मिला है। तभी तो सत्ता कोई रही हो अनजान कभी किसी के सामने न झुकें न डिगे। पिता से विरासत में मिले मजलूमों के लिए संघर्ष करो का जुनून हमेशा ज़िन्दा रखे।
कम्युनिस्ट के गढ़ में कम होते प्रभाव में भी अंतिम समय तक किया झंडा बुलंद…
आजादी के आंदोलन के दौरान से ही पूर्वांचल के यह इलाका बागियों का इलाका कहा जाता था। घोसी कामरेड जयबहादुर सिंह, झारखण्डे राय, सरयू पांडेय आदि बहुत से क्रांतिकारी नेताओं ने इस जमीन को सींचकर आम जनमानस की आवाज को मजबूत किया था। अनजान जब यहाँ राजनीति में सक्रिय हुए तो कम्युनिस्ट पार्टी राजनैतिक रुप से कमजोर हो रही थी, लेकिन अनजान ने कभी भी देश और विदेश में अपनी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय छवि तथा घोसी में खिसकते जनाधार का प्रभाव अपने ऊपर नहीं आने दिया वे भले ही बड़े राजनेता के रूप में जाने जाते थे लेकिन घोसी से रिश्ता उन्होंने अंतिम साँस तक निभाई। घोसी की जनता ने भले ही कई बार उनके चुनाव लड़ने पर उन्हें अपना जन प्रतिनिधि नहीं चुना, लेकिन इस स्थिति में भी अनजान ने घोसी की जनता से कभी भी अपना प्रेम कम नहीं किया।
काश मुलायम होते और अनजान बीमार न होते!
इस बात पर भले ही कोई विश्वास न करे, लेकिन यह सच है कि अगर आज भारतीय राजनीति में मुलायम सिंह यादव जीवंत होते और अतुल अनजान बीमार न होते तो हो सकता है यह सीट उनके लिए सपा को छोड़ना पड़ता! लेकिन जब 2024 लोकसभा का चुनाव आया तो अनजान जी बीमार हो गए, उधर मुलायम सिंह भी दिवंगत हो गए, नहीं तो हो सकता था कि इस बार राजनीति में वे और सक्रिय नज़र आते! घोसी की सियासत व यूपी में कमजोर हो चुके कम्युनिस्ट को सपा व कांग्रेस के गठबंधन में अमृत दे जातें, और एक बार फिर घोसी एक शीर्ष व शिखर पुरुष के नाम से जाना जाता, लेकिन ऐसा हो न सका!
घोसी ही चुना… घोसी ही बुना…
ऐसे में श्री अनजान उस विरासत को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से इसी क्षेत्र में अपनी सक्रियता ज्यादा दिखाते रहे। 1986 में पहली बार घोसी बसस्टैंड पर श्री अनजान से मेरी पहली मुलाकात हुई। तत्कालीन कम्युनिस्ट नेता जुल्फेकार अहमद और दीना नाथ सिंह ने मेरी मुलाकात कराई और तबसे हमलोग लगातार साथ मे ही रहे। घोसी से श्री अनजान का इतना लगाव हो गया था कि वह घोसी नगर के बड़ागांव उत्तरी में अपना खुद का मकान बनवा लिए और पिछले 20 वर्षों से वह जब भी जिले में आते उसी में रहते।
आज उनके निधन से पूरा क्षेत्र आंसू बहा रहा है। सुबह जैसे ही निधन की जानकारी लोगों को हुई एक दूसरे से मिलकर शोक संवेदना व्यक्त करने का दौर चल रहा है। सैकड़ों लोग लखनऊ पहुंच गए हैं और शनिवार को उनके अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए सैकड़ों लोग और लखनऊ पहुंचेंगे। श्री अनजान के निधन से उत्तर भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन को बहुत बड़ा आघात पहुँचा है तथा निकट भविष्य में यह रिक्ति पूरी हो पाना सम्भव प्रतीत नहीं हो रहा है।
मुलायम सिंह यादव ने भरी मंच से कहा था अनजान की जगह संसद में है…
भले ही अनजान सीपीआई के लीडर रहे हों लेकिन उनकी पकड़ सत्ता के बड़े चेहरों से कम नहीं था, मऊ कलेक्ट्रेट में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के महान सेनानी तथा पूर्व सांसद जय बहादुर सिंह व झारखण्डे राय की प्रतिमा अनावरण का काम श्री अनजान के ही अथक प्रयास से हो सका। अनावरण कार्यक्रम के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की मौजूदगी तथा हजारों लोगों की जनसभा में पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व रक्षा मंत्री मुलायम सिंह यादव ने ललकारते हुये कहाकि श्री अनजान को लोकसभा में जाना चाहिए और यहाँ के लोगो को जरूर लोकसभा भेजना चाहिए ताकि किसानों, मजदूरों के हित की आवाज संसद में सुनाई दे सके।
किसान व नेता ही नहीं, लेखक भी थे अनजान!
आज की राजनीति पीढ़ी भले ही अनजान को सिर्फ़ एक नेता ही समझती हो, लेकिन अतुल कुमार अनजान एक बहुत अच्छे लेखक थे उनका लेख देश के बड़े से बड़े समाचार पत्रों में छपता था जिससे वे काफ़ी अच्छा पारितोषिक पाते थे। इसके अलावा जब पुराने नेता जिन्हें ऐसे ख़बरों की समाज को ज़रूरत थी वे अनजान के लिखे लेख को पढ़ते थे और उसे ज़रूरत के हिसाब से अपने सत्ता में या विपक्ष में अपने ज़रूरत के हिसाब से इस्तेमाल करते थे।
परिवार, घर-आँगन…
बिहार के कम्युनिस्ट पार्टी के दिग्गज नेता जो बिहार सरकार में मंत्री तथा कईबार राज्यसभा के सदस्य रहे। उनकी पुत्री भारती सिन्हा से अतुल अनजान परिणय सूत्र में बंधे। छात्र जीवन में भारती सिन्हा भी आल इण्डिया स्टुडेंट्स फेडरेशन से जुड़ी रहीं। दोनों लोगों ने साथ मे छात्रों के लिये काम किया और फिर शादी कर लिया दिल्ली में ही रहती हैं।
बेटी विदुषी दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ाई करने के बाद टीवी में पत्रकारिता करती हैं।
संसद भले न पंहुचे लेकिन बहुतेरे सांसदों से बड़ी हस्ती थे अनजान!
अतुल कुमार अनजान भले ही संसद में न पहुँच पाए हों लेकिन उनकी पकड़ उनकी पहचान उनकी ताक़त बहुतेरे सांसदों से ज़्यादा थी! संसद में बैठकर भी बहुतेरे सांसद ऐसी बातें न कह पाते हैं न बोल पाते हैं ऐसे में अतुल कुमार अनजान बिना सांसद के सत्ता की चूलें हिला देते थे।








