रचनाकार

काग़ज़ का कुरूक्षेत्र : आखिर क्यों?

अरविन्द कुमार सिंह

भीतर का द्वंद्व जब अपनी सीमाओं से बाहर निकल,असीम वेदना के तटबंधों को तोड़ देता है, तो वह समूची मनोगत पीड़ा का हिंद महासागर- भीतर से बाहर, क़लम के सहारे काग़ज़ पर उतरने लगता है. जिसमें वेदना का चरम होता है तो विषमता की अन्तहीन पीड़ा. मानवता की चीख होती है तो अबोली पीड़ा का मुख़र मौन. काल-चिंतन होता है तो समय और सिस्टम से संघर्ष करते सवाली नश्तर.
फिर बनता है एक ‘काग़ज़ का कुरूक्षेत्र’ जो मनुष्य के भीतरी पीड़ा और काल चिंतन की शाश्वत जीवन धारा बन सदैव स्पंदन करता रहता है. इस चिंतन प्रक्रिया में जो हमने महसूस किया है, उसके अनुसार-
‘काग़ज़ का कुरूक्षेत्र’ लिखा नहीं जाता है, बल्कि जीया जाता है, भोगा जाता है, महसूस किया जाता है और अपने समय के सवालों का हिस्सा बना जाता है,
ताकि सच जिंदा रहे, ताकि संवेदनाओं की मंडी में इंसानियत कहीं टूटकर बिखर ना जाए. ताकि झूठ और फरेब की दीवार बहुत ऊंची ना हो जाए. ताकि संवेदना बनावटी और मौलिकता कृत्रिम ना हो जाए. ताकि लोक की चीख़ निकाल देने वाला तंत्र, निरंकुश ना हो जाए. ताकि सत्य, अहिंसा, परोपकार, सामाजिकता, इंसानियत, जनतंत्र और विश्वास जैसे शब्दों के मायने ना बदल जाए.
इन्हीं मायनों को अक्षुण्ण रखने के लिए- कुरूक्षेत्र बनता रहेगा, हर काल में, हर परिस्थिति में,और हर हाल में.
कुछ लोग कुरूक्षेत्र बनाते रहेगें, और उसे काग़ज़ पर उतारते रहेगें. क्योंकि कुरूक्षेत्र का, कुरूक्षेत्र बने रहना ही उसकी नियति है, उसका प्रारब्ध है, उसका भाग्य है, चाहे वह मनुष्य के भीतर बने या काग़ज़ पर, हर्फ़ों के सांचे में ढल कर.-

पुस्तक- 'काग़ज़ का कुरुक्षेत्र' का एक अंश लेखक- अरविंद कुमार सिंह प्रकाशक- परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *