रिश्तों की डोर ढीली हो रही है!
@ डॉ अरविन्द सिंह…
मेजर चन्द्रिका सिंह बिसेन बाबा जब फ़ौज की सेवा के बाद नागरिक पुलिस में बतौर ट्रेनर चैथम लाइन इलाहाबाद आए तो साथ में हमारे घर की पहली पुत्री विद्या बुआ को भी साथ लेते गयें। उस समय उनकी उम्र बमुश्किल से 10-12 की रही होगी। बुआ घर की लाडली थीं। बुआ बताती हैं कि हमारी शादी मेजर काका ने लालगंज में किया था। एक सप्ताह की छुट्टी लेकर आए और उसी पीरियड में शादी कर दियें। हमारे खानदान की सबसे बुजुर्ग यही बुआ हैं। 85 से 90 के करीब पहुंच रही हैं। इनसे 10बरस छोटे हमारे बाबू जी भी चलें गयें।
पिछले दिनों वाराणसी से आते हुए देर शाम हम बुआ के घर रुक गयें। चित्र में तीन पीढ़ियों के साथ गांव का घर दिख रहा है। ऊपर ओसारा है। ओसारे में लकड़ी रखी है। तखत पर बुआ,बुआ का भतीजा और भतीजे का पुत्र।
आदमी के पास सबकुछ है लेकिन रिश्तों की डोर कमजोर पड़ती जा रही है। कभी महीनों रिश्तेदारियां करने वाले समाज के पास अब समय नहीं है। उन रिश्तों को निभाने का भी, जो पीढ़ियों से साथ रहें हैं। मैं बुआ के यहां पहली बार रुका। बहुत अच्छा लगा। साथ ही यह सीख भी मिली की हमारे बुजुर्ग मूर्ख तो बिल्कुल नहीं थे कि हर नई पुरानी रिश्तेदारों के यहां प्रायः जाते थे। एक तो आदमी के मानस में बदलाव आता था। दूसरे, रिश्तों की डोर मजबूत होती थी। हताशा, और अवसाद जैसी बीमारियां नहीं थी। यही भारतीय गांवों की बसावट और मनोविज्ञान था। हमने तय किया कि इस भागदौड़ भरी जिंदगी में भी पुराने और नयें रिश्तों को पुनः जीवंत करेंगे। हर- सप्ताह, दो-सप्ताह में रविवार या छुट्टी में किसी न किसी रिश्तेदार के यहां पहुंचने की कोशिश करेंगे। रिश्तों की डोर पुनः मजबूत करेंगे। मुझे लगता है कि यही परिवार और समाज की पूंजी है। यही प्रेम और सद्भाव है। यही जिन्दगी है।


