क्यों खानी चाहिये फाइलेरिया और पेट के कीड़े मारने की दवा : सीएमओ

● परजीवी वह कीटाणु हैं जो व्यक्ति में प्रवेश करके सारे पोषक तत्व को चूस लेते हैं
● पेट में कीड़े होने से व्यक्तियों के शरीर में खुराक नहीं लगती और व्यक्ति शारीरिक व मानसिक रूप से कमजोर हो जाता है

मऊ। जनपद में मास एडमिनिस्ट्रेशन राउंड (एमडीए) के तहत स्वास्थ्य कार्यकर्ता फाइलेरिया की दवा लोगों को खिला रही हैं। इसी क्रम में गुरुवार को भी जनपद के कई इलाकों में फाइलेरिया की दवा खिलाई गई।  मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ श्याम नरायन दुबे ने बताया कि पेट में कीड़े होने की कई वजह होती हैं पर मुख्य रूप से यह दूषित खान-पान के सेवन की वजह से होता है। गंदे हाथों से भोजन करना, खुले में रखे हुए भोजन को खाना, अधिक मीठा खाना, दिन भर सिर्फ आराम करना और परिश्रम न करने से पेट में कीड़े या कृमि हो जाते हैं। कृमि लंबे, आवरणहीन और बिना हड्डी वाले होते हैं। कृमि परजीवी वह कीटाणु हैं जो व्यक्ति में प्रवेश करके बाहर या भीतर (ऊतकों या इंद्रियों से) जुड़ जाते हैं और सारे पोषक तत्व को चूस लेते हैं। इनके बच्चे अंडे या कृमि के रूप में बढ़ते हुए त्वचा, मांसपेशियां, फेफड़ा या आंत (आंत या पाचन मार्ग) के उस ऊतक (टिशू) में कृमि के रूप बढ़ते जाते हैं। कृमि संक्रमित करने के साथ व्यक्ति को कमजोर और उसके अंदर मौजूद रोग से लड़ने की क्षमता को खत्म कर देता है जिससे रोगी आसानी से किसी भी रोग का शिकार हो जाता है। डॉ श्याम नरायन दुबे ने बताया कि पेट में कीड़े के लक्षणों में पेट में दर्द होना, रोगी के वजन कम हो जाना, आँखे लाल होना, जीभ का सफ़ेद होना, मुंह से बदबू आना, गले पर धब्बे पड़ना, शरीर पर सूजन आना, गुप्तांग में खुजली का होना है। पेट में होने वाले कीड़े या कृमि से व्यक्तियों के शरीर में खुराक नहीं लगती और व्यक्ति शारीरिक व मानसिक रूप से कमजोर होने लगता है। वहीं फ़ाइलेरिया के लक्षणों में बुखार, बदन में खुजली, तथा पुरुषों के जननांग में तथा उसके आसपास दर्द या सूजन, पैरों व हाथों में सूजन, हाथीपाँव और हाईड्रोसील तथा काइलूरिया (पेशाब में सफ़ेद पदार्थ का जाना जिसे धातु रोग भी कहते हैं। फ़ाइलेरिया रोग के शरीर में उभरने के बाद असाध्य और लाइलाज हो जाता है, इसलिये इसे शरीर में मौजूद होते हुए भी पहले ही दवा का सेवन करा के प्रभावहींन और निष्क्रिय कर दिया जाता है।


अपर मुख्य चिकित्सा अधिकारी नोडल डॉ आरवी सिंह ने बताया कि पेट में कृमियों को समाप्त करने के लिए एल्बेंडाज़ोल दी जा रही है। फाइलेरिया के संक्रमण से बचाने के लिये डीईसी (डाई एथायिल कार्बामेजिन साईट्रेट) की दवा नियमानुसार खिलाई जा रही है। जिला मलेरिया अधिकारी बेदी यादव ने बताया कि फाइलेरिया और कृमि नाशक दवा पूरे जनपद के व्यक्तियों को आशाओं के द्वारा अपने सामने ही खिलाई जा रही है। इन दोनों दवाओं को दो वर्ष से कम आयु के बच्चों को, गर्भवती महिलाओँ को और बिस्तर पर पड़े बृद्ध, गंभीर रोग से ग्रसित लोगों को नहीं खिलानी है। दवा का सेवन खाली पेट नहीं कराया जाना है। यह टीमें घोषित तिथि को घर-घर भ्रमण कर लक्षित जनसंख्या को अपने सामने मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एमडीए) दवा का सेवन करायेंगी। जो भी लोग किसी कारण वंचित रह जाते हैं तो वह स्वयं भी आशा के घर जाकर इस दवा को खा सकते हैं। 
फाइलेरिया के संक्रमण के साथ कृमि से बचने के लिये मच्छरदानी का प्रयोग, आस-पास साफ-सफाई रखें तथा अभियान में फ़ाइलेरिया से बचाव की दवा अवश्य खायें।
  

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