धर्म

सलाम साकिब

■ डॉ. अम्बरीष राय…

इसमें कोई दो राय नहीं है कि हिन्दुस्तान में धर्म ख़ासी मुश्क़िल से गुज़र रहे हैं. लिहाज़ा धर्म को बचाने के लिए धर्म रक्षक डिमांड में हैं. मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान भी प्रकारान्तर से धर्म रक्षकों की फ़ौज में इज़ाफा चाहता है. परिणामस्वरूप यत्र तत्र कट्टर लोग कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हैं. धर्म केन्द्र में है और धार्मिकता हासिए पर. पिछले दिनों मुजफ्फरनगर में किसानों की एक बड़ी पंचायत हुई. इस पंचायत में हर हर महादेव और अल्ला हू अकबर का गगनचुंबी नारा लगाया गया. महादेव तक तो ठीक था लेकिन किसान नेता नरेश टिकैत के अल्ला हू अकबर का नाम लेते ही हिन्दू और हिंदुत्व ख़तरे में आ गया. एक बड़ी जमात ने ऐतराज़ जताया. कहा गया कि हिन्दू भले अल्ला हू अकबर कह ले, मुस्लिम कभी हर हर महादेव नहीं कह सकता. आरोप प्रत्यारोप के बीच मुझे याद आया बनारस. याद आए काशी विश्वनाथ महादेव. याद आया साकिब भारत. जो कभी साकिब खान था.

कृष्ण के मंदिर में जन्माष्टमी का पूजन करते साकिब ने कितनी बार हर हर महादेव का जयकारा लगाया होगा, उसे याद भी नहीं. एक बात आपको जानना ज़रूरी है कि साकिब ने अपना मज़हब नहीं बदला है. साकिब की ज़ुबान से मैंने कितनी बार अल्लाह का नाम सुना है, ये मुझे भी याद नहीं है. एक और बात जमा ख़ातिर रखिए कि साकिब भाजपा या उसके अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ से नहीं जुड़ा है. आजकल बहुतेरे टोपी दाढ़ी वाले सत्ता से डर कहिए या फिर सत्ता की मलाई काटने के लिए भाजपा में छोटे मोटे पदाधिकारी बन गए हैं. ये और बात है कि वो वोटों की शक़्ल में तब्दील नहीं हो पाते. ख़ैर लौटते हैं बनारस. उस बनारस में जहाँ की गलियां महादेव के आशीर्वाद से खिलती हैं तो साकिब जैसी शख़्सियत से गुलज़ार रहती हैं. गंगा जमुनी तहज़ीब की क़िस्साई दुनिया से परे बनारस का ये नौजवान अपने क़िरदार में निहायत ही ख़ूबसूरत है. वैसे मुझे तो वो शक्लोसूरत में भी किसी फिल्मी हीरो से कम नहीं लगता.

साकिब से मेरी मुलाक़ात मेरे गुरु स्वामी ओमा दी अक्क की वजह से हुई. साकिब गुरु जी का दत्तक पुत्र है, ये जानकर मेरी दिलचस्पी उसमें बढ़ी. धीरे धीरे जानकारियां भी बढ़ीं. धर्म जाति को लेकर आपमें भले ही कितना मान अभिमान हो, लेकिन सच्चाई यही है कि इस देश ने सबसे ज़्यादा मुसीबत इन्हीं दोनों के चलते झेली हैं. भुगत रहा है. लाखों ज़िंदगियां जातीय, धार्मिक दंगों की भेंट चढ़ चुकी हैं तो देश की अरबों खरबों की संपत्ति भी नष्ट हो चुकी है. आम मान्यता है कि मुसलमान एक कट्टर मज़हबी होता है. और यह कट्टरता उसको अन्य धर्मों के प्रति असहिष्णु बनाती है. लेकिन यक़ीन मानिए साकिब से मिलते ही आपकी ये धारणाएं खंडित होने लगेंगी. साकिब को एक दिन एहसास हुआ कि अगर एक बेहतर मुल्क़ बनाना है तो बेहतर कदम भी उठाए जाने चाहिए. अपने गुरु स्वामी ओमा दी अक्क का आशीर्वाद ले इस ठेठ बनारसी लड़के ने एक श्रेष्ठ भारत बनाने के लिए अपने सफर का आगाज़ किया. शुरुआत खुद से की और अपने नाम से जाति को विदा कर दिया. जाति की जगह लिखा भारत. वो भारत जो हमारी पहचान है, हमारा देश है. हमारी संस्कृति है, हमारा गुरुर है. इसी के साथ शुरू हुआ “हम भारत हैं” अभियान. यह अभियान लोगों से जाति की पहचान छोड़ने का आग्रह करता है. यह अभियान लोगों से अपील करता है कि जाति के स्थान पर अपने देश का नाम लिखें. भारत लिखें.

पिछले दिनों में मैंने काशी की कई यात्राएं की हैं. मैं संयोग से साकिब के साथ था. भगवान भास्कर अपनी किरणों को समेट रहे थे. बनारस अपने यौवन पर था. महादेव आख़िरी समाजवादी थे. तो उनकी नगरी काशी इससे कैसे अछूती रहती. पूंजी यहाँ थोड़ा सिमटकर रहती है. कारें गैरेज में तो मोटर वाली साइकिलें मुख्यधारा में. हम भी चल पड़े गलियों वाले बनारस में दो एक गैरज़रूरी जरूरी काम से. मौज प्राथमिकता थी तो कुछेक चीजें सेकेण्डरी. एक फोन आया और साकिब ने मोटरसाइकिल रोक दी. मोटरसाइकिल एक किनारे खड़ी करके साकिब बात में मशगूल, चेहरे पर संवेदना के रंग बदलते गए तो आवाज़ में परवाह और निश्चिन्तता के स्वर मुझ तक पहुंचे. साकिब की टेलीफोनिक वार्ता अंज़ाम तक पहुंची. मैं कुछ कहने को ही था कि वो अगला नंबर डायल कर चुका था. उसने फोन पर कहा कि आप अस्पताल पहुंचिए, आपको खून मिल जाएगा. आप बिलकुल चिन्ता मत करिए, जितने खून की ज़रूरत होगी, मैं इंतजाम करूंगा. आप बस अपने मरीज़ के पास पहुंचिए. फिर मुझे साकिब ने बताया कि एक औरत लहुराबीर में सड़क पर खड़ी होकर खून की भीख मांग रही थी, उसका पति अस्पताल में अकेले पड़ा है. बातचीत में पता चला कि उक्त ब्राह्मण दंपत्ति इलाज के लिए रेणुकूट से आए हैं, जिनका एक दूसरे के अलावा मौजूदा वक़्त में कोई नहीं है. साकिब ने यह सुनिश्चित किया कि उक्त महिला को अस्पताल में किसी प्रकार की असुविधा ना हो.

इंसानियत के इस चेहरे को मैं बस देखता रह गया. मैं देखता रह गया कृष्ण का श्रृंगार करते, बांसुरी बजाते एक मुस्लिम नौजवान को, मैं देखता रह गया हाथ उठाकर हर हर महादेव करने वाले देसी बनारसी को. मैं देखता रह गया प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र में सच्ची भारतीयता को जीते एक ज़िंदादिल शख़्स को. एक शख़्स जो अनूठी शख़्सियत रखते हुए भी निहायत ही सादा है, सुलभ है. सुंदर है. साकिब भारत पिछले पाँच सालों से वाराणसी नगर निगम के ब्राण्ड एम्बेसडर हैं. समाज के हर हिस्से की तकलीफ़ को महसूस करना, उसको दूर करने की पुरजोर कोशिश करना, सामाजिक धार्मिक ढाँचा दुरुस्त रखना साकिब भारत अपनी ज़िम्मेदारी समझते हैं. और इनकी इन्हीं जिम्मेदारियों ने उनको अनगिनत सरकारी और गैर सरकारी पुरुस्कारों से नवाज़ा है. साकिब भारत जैसी नौजवानी इस बिखरते देश की उम्मीद हैं. साकिब पैदा होते रहें तो भारत के मूल्यों को, सामाजिक ताने बाने को डरने की ज़रूरत नहीं है. घबराने की ज़रूरत नहीं है. बाकी सियासत ने तो ख़तरे बढ़ा ही रखे हैं. सलाम साकिब.

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