तिरस्कार को सकारात्मक अर्थ में ग्रहण करने से होता हैं व्यक्तित्व का परिष्कार

( मनोज कुमार सिंह प्रवक्ता )

प्रायः तिरस्कार को बोली-भाषा, आचरण-व्यवहार, शिष्टाचार और साहित्यिक समझ-बूझ और समझदारी में नकारात्मक दृष्टि से ग्रहण किया जाता है। भावाभिव्यक्ति, सामाजिक संबंधों और आम जन-जीवन में तिरस्कार को अपमानजनक आचरण का परिचायक समझा जाता हैं। परन्तु कदाचित तिरस्कार के कारण मर्माहत हृदयों ने तिरस्कार के फलस्वरूप उत्पन्न आक्रोश को अगर सकारात्मक, सृजनात्मक और रचनात्मक चेतना तथा व्यापक दृष्टिकोण के अनुरूप ढाल लिया तो इसके परिणाम चमत्कारिक और ऐतिहासिक होते हैं। कभी-कभी तिरस्कार और अपमान के कारण किसी-किसी मनुष्य में व्यापक अंतदृष्टि पैदा हो जाती हैं। इस अंतदृष्टि की अनुभूति और आवेग की लहरों पर सवार होकर व्यक्ति ऐसा करिश्मा कर जाता हैं कि-पूरी दुनिया आश्चर्यचकित होकर देखती रह जाती हैं। तिरस्कार व्यक्ति को अपनी अंतर्निहित क्षमताओं का आत्मनिरीक्षण करने का अवसर प्रदान करता है। जब कोई व्यक्ति तिरस्कार और अपमान के कारणों पर गम्भीरता से चिंतन मनन करते हुए और अपनी अंतर्निहित क्षमताओं का वास्तविक आकलन करते हुए दृढ इच्छा शक्ति के साथ किसी महान उद्देश्य को प्राप्त करने की सदिच्छा के साथ अटल और अविरल पथिक की तरह संघर्ष के पथ पर बढ जाता हैं तो निश्चित रूप से एक नया इतिहास रचने का कार्य करता है।
अधिकांश इतिहासकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि-दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी रेल यात्रा के दौरान पुरी दुनिया में सभ्यता का ढिढोरा पिटने वाले श्वेत लोगों द्वारा तिरस्कृत और अपमानित नहीं हुए होते तो महात्मा गाँधी वैश्विक क्षितिज पर अग्रपांक्तेय मानवतावादी नहीं हुए होते। रेल यात्रा के दौरान श्वेत लोगों द्वारा हुए तिरस्कार और अपमान ने महात्मा गाँधी को मानवीय मूल्यों, मर्यादाओं और मानवता के प्रति गहरे रूप से झकझोर कर दिया। स्वतंत्रता, समानता बंधुता और सभ्यता का ढोल-नगाड़ा बजाने वाले सफेदपोश अंग्रेज व्यवहारिकता के स्तर पर रंग ,नस्ल और प्रजाति के नाम पर तरह तरह के भेदभाव रखते थे। पूरी दुनिया को सभ्य बनाने की जिम्मेदारी का दम्भ भरने वाले व्यवहारिकता के धरातल पर पूरी दुनिया को गोरे-काले चश्मे के आधार पर देखते थे और अपनी नस्ल को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ ,सुसभ्य और सुसंस्कृत नस्ल मानते थे। दक्षिण अफ्रीका में रेल यात्रा के दौरान श्वेत लोगों द्वारा हुए तिरस्कार और अपमान ने महात्मा गाँधी को रंग और नस्ल के आधार पर होने वाले भेद-भावों के विरुद्ध सच्चा सत्याग्रही बना दिया। अधिकांश राजनीतिक विश्लेषको का अभिमत है कि- महात्मा गाँधी के अन्दर सत्याग्रही का बीजांकुर दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के विरुद्ध किए गए संघर्ष के दौरान ही पडा। विदेशी धरती पर महात्मा गाँधी ने सत्याग्रह के माध्यम से जो आन्दोलन किया वह वैश्विक इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ। इस आंदोलन की कोख से रंगभेद, नस्लभेंद और प्रजातिवाद के विरुद्ध सम्पूर्ण विश्व में आन्दोलन आरम्भ हो गये । मनुष्य और मनुष्यता के पक्ष में गांधी द्वारा दक्षिण अफ्रीका की धरती किया गया संघर्ष मानवता की दृष्टि से अविस्मरणीय रहेगा। इसी संघर्ष ने एक वकील मोहन दास करमचंद गाँधी को महान मानवतावादी मूल्यों के लिए लड़ने वाला महात्मा गाँधी के रूप में सच्चा लडाका बना दिया। ध्यातव्य हो कि-अभी हाल ही में मानवशास्त्रियो का वैश्विक सम्मेलन हुआ जिसमें कहा गया कि-प्रजाति (Race) नाम की कोई चीज होती ही नहीं है और दुनिया का सभ्य और असभ्य के मध्य बंटवारा साम्राज्यवादी दृष्टिकोण हैं। सम्पूर्ण विश्व में हर इंसान अपने भूगोल और अपने पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुरूप अपना खान-पान रहन-सहन और वेश-भूषा तय करता है। इसलिए किसी दूसरे भूगोल और परिस्थिति के हिसाब से किसी को असभ्य कहना कतई तर्क संगत नहीं है।
कभी-कभी तिरस्कार उन लोगों द्वारा भी होता है जिसको व्यक्ति सर्वाधिक प्रेम करता है।अपनों द्वारा हुए अपमान और तिरस्कार की कोख से भी कई विभूतिओं ने जन्म लिया। हमारी समृद्ध साहित्यिक और सांस्कृतिक गवेषणा में अद्भुत उदाहरण महामूर्ख कालीदास से विद्वान कालीदास के रूपांतरण के रूप में मिलता है। अपने दौर की महान विदुषी विद्योतिमा को पराजित और अपमानित करने के लिए के कुछ अंहकारी और पुरूषवादी मानसिकता से ग्रसित विद्वानों ने विद्योतिमा के समक्ष महामूर्ख कालीदास को शास्त्रार्थ के लिए प्रस्तुत किया। विद्योतिमा को पराजित करने की मंशा से और षड्यंत्र वश विद्योतिमा और कालीदास के होने शास्त्रार्थ का स्वरूप मौन और सांकेतिक रखा गया। इस मौन और सांकेतिक शास्त्रार्थ के माध्यम से षडयंत्रकारी विद्वानों ने विद्योतिमा को पराजित करने में सफलता प्राप्त कर ली । शास्त्रार्थ की शर्तों के अनुसार विद्योतिमा को महामूर्ख कालिदास के साथ परिणय सूत्र में बंधना पडा । कालीदास से प्रथम प्रणय मिलन के उपरांत ही विद्योतिमा को अपने साथ हुए छल कपट और षड्यंत्र का ज्ञान और भान हो गया। प्रथम प्रणय मिलन में विद्योतिमा महामूर्ख कालीदास को पहचान लिया और षड्यंत्र से जली भूनी विद्योतिमा ने कालिदास को बुरी तरह अपमानित कर धक्के मारकर घर से भगा दिया। इस तिरस्कार ने महामूर्ख कालीदास को पुरी तरह झकझोर दिया। इस तिरस्कार के फलस्वरूप महामूर्ख कालीदास ने सच्चे हृदय से माॅ काली की आराधना किया। हमारी धार्मिक और आध्यात्मिक चिंतन परम्पराओं में यह धारणा प्रचलित है कि-सच्चे हृदय से की गई प्रार्थना और सच्ची नियति से किया गया परिश्रम अवश्य फलितार्थ होता हैं। महामूर्ख कालिदास ज्ञान गंगोत्री में डुबकी लगाने लगे और अंततः ज्ञान गंगोत्री में डुबकी लगाते लगाते महामूर्ख कालिदास सरस्वती के सर्वश्रेष्ठ साधक, उपासक और उसके फलस्वरूप महाज्ञानी तथा महाकवि बनकर निकले। महाकवि कालिदास ने जो उत्कृष्ट साहित्यिक सृजन किया वह सम्पूर्ण वैश्विक साहित्य में अमर कृति बन गए। महाकवि कालिदास के महज चार नाटक अभिज्ञान शाकुंतलम, मेघदूतम्, कुमारसम्भव और रघुवंशम् समस्त पाश्चात्य नाटकों पर भारी पड़ते हैं। महाकवि कालिदास के इन नाटकों का अनुवाद विश्व की लगभग सभी प्रमुख भाषाओं में हुआ।
अपनो के तिरस्कार और अपमान की गहरी पीडा से उपजे महान व्यक्तित्वो में एक अनुपम उदाहरण मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन के नवरत्नो में से एक महाकवि तुलसीदास के रूप में मिलता है। तुलसीदास अपनी अर्द्धांगिनी रत्नावली से अत्यधिक प्यार करते थे। कुछ समय के लिए रत्नावली अपने पैतृक घर चली गयी तो तुलसीदास व्याकुल और बेचैन रहने लगे। एक समय यह व्याकुलता अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गई और प्रेमातुर तथा कामातुर तुलसीदास मध्यरात्रि में ही तमाम विघ्न बाधाओं को पार करते अपनी सहधर्मिणी रत्नावली से मिलने उसके घर पहुँच गए। परन्तु रत्नावली ने प्रेमातुर तुलसीदास को गहरी फटकार लगाई। कुछ किंवदंतियों के अनुसार रत्नावली ने कहा कि- जितना प्यार आप मुझसे करते हैं उतना ही प्यार मर्यादा पुरुषोत्तम राम से करते तो सम्पूर्ण जीवन तर जाता। अपनी अर्द्धांगिनी की दुत्कार और फटकार ने तुलसीदास के अंतः करण को झकझोर दिया और इस दुत्कार के फलस्वरूप तुलसीदास के अंतः करण में मर्यादा पुरूषोत्तम राम के प्रति उत्कट और अद्वितीय अलौकिक और आध्यात्मिक प्रेम जाग्रत कर दिया। इस जागृति और मर्यादा पुरुषोत्तम राम के सम्पूर्ण जीवन-चरित्र में डूबन ने तुलसीदास को भारतीय मध्ययुग का सर्वश्रेष्ठ साहित्यकार बना दिया। मर्यादा पुरुषोत्तम राम के सम्मान और आराधना में जो साहित्यिक सृजन तुलसीदास ने किया वह भारतीय साहित्य की अनमोल धरोहर बन गया। तुलसीदास दास कृत रामचरित मानस और रामायण के माध्यम मर्यादा पुरुषोत्तम का सम्पूर्ण जीवन चरित्र भारतीय जनमानस में पूरी श्रद्धा से स्मरण किया जाता हैं।
अनादर,अपमान और तिरस्कार के फलस्वरूप शक्ति-स्वरूपा मातृशक्तियों ने भी अपने चमत्कारिक कृतित्व द्वारा भारतीय इतिहास को गौरवान्वित करने का कार्य किया है। इसमें जनक नन्दिनी सीता और हस्तिनापुर पर नरेश महाराजा दुष्यंत की परित्यक्ता शकुन्तला का नाम अत्यंत श्रद्धा से लिया जाता हैं। लंका पर विजय प्राप्त करने के उपरांत और अयोध्या में अपने राज्याभिषेक के उपरांत मर्यादा पुरुषोत्तम ने जनसाधारण के कुछ लोगों द्वारा सीता चरित्र पर प्रश्न चिह्न लगाने पर मर्यादा पुरुषोत्तम ने अपनी अर्द्धांगिनी और अयोध्या की महारानी सीता को वनगमन का आदेश दे दिया। परन्तु सीता ने अपने दामन पर लगे दाग को मिटाने के लिए अनवरत साधना की महाकवि बाल्मीकि के आश्रम में रहकर लव और कुश का इस तरह पालन पोषण किया कि-सीता के दोनों पुत्र लव और कुश ने बहुविवीध पराक्रम से सम्पूर्ण बसुन्धरा को धन्य कर दिया। सीता की जागती आँखों की परवरिश का करिश्मा था कि- जिस अश्वमेघ के अश्व को बांधने का साहस सम्पूर्ण आर्यावर्त में किसी सूरमा के अंदर नहीं हुआ उस अश्व लव और कुश ने बांध दिया। यही नहीं जिस उम्र में बच्चों के हाथ में खिलौने अच्छे लगते हैं उस उम्र में लव और कुश ने तीर धनुष उठाया और एक एक कर उन सारे सूरमाओं को ठेर कर दिया जिन सूरमाओं के बल पर मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने महायोद्धा और महाबली रावण को परास्त किया था। इसी तरह का जौहर हस्तिनापुर दरबार से अपमानजनक तरीके तिरस्कृत की शकुन्तला ने भी दिखाया। हस्तिनापुर दरबार से बुरी तरह अपमानित हूई शकुन्तला रोती- बिलखती ऋषि कश्यप के आश्रम में चली गई और ममता के जाग्रत ऑचल से अपने पुत्र का पालन करना आरंभ किया। यह शकुन्तला के जाग्रत ऑचल का करिश्मा था कि- महज छः वर्ष की उम्र में शकुन्तला के पुत्र भरत के पराक्रम की गूंज सम्पूर्ण बसुन्धरा पर होने लगी। कालान्तर में शकुन्तला के पुत्र भरत ही हस्तिनापुर नरेश हुए और हस्तिनापुर को अपने पराक्रम जो विस्तार दिया वह विस्तार भरतवंश का अन्य कोई सम्राट नहीं कर पाया। इतिहास की विडम्बना है कि-जिस बच्चे की पहचान के लिए शकुन्तला हस्तिनापुर दरबार से तिरस्कृत हूई उसी बालक के नाम पर न केवल हस्तिनापुर की वंश परंपरा चलती रही अपितु तबसे लेकर आजतक इस भारतीय बसुन्धरा को शकुन्तला के बेटे और हस्तिनापुर के पहले चक्रवर्ती सम्राट भरत के नाम पर जाना पहचाना जाता हैं।
निष्कर्षतः तिरस्कार और अपमान में इतिहास रचने और करिश्मा करने की अद्भुत क्षमता छिपी रहती है। इसलिए अपमान और तिरस्कार के उपरांत गम्भीरता से आत्म चिंतन कर उससे उत्पन्न सकारात्मक सृजनात्मक और रचनात्मक चेतना से ऊर्जस्वित होकर किसी महान उद्देश्य को प्राप्त करने का प्रयास करें।

मनोज कुमार सिंह प्रवक्ता
बापू स्मारक इंटर दरगाह मऊ।

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