लाॅक डाउन और भारत

अपना हाथ तानने से पहले दूसरों की नाक के बारे में सोचिए….

(देवकान्त पाण्डेय)

सरकार ने जब लॉकडाउन को खोलते हुए लोगों की सुविधा के लिए तमाम बन्दिशों से रोक हटाई तो नियम बनाते हुए नागरिकों को यह संदेश भी दिया कि कोरोना से बचने के लिए सतर्कता जरूर अपनाएं अर्थात घर से निकलिए तो मास्क पहन के रखिये, लोगों से कम से कम दो गज की शारीरिक दूरी बनाकर रखिए, कुछ घंटों के अंतराल पर हाथों को साबुन-पानी से धोते रहिए या सेनिटाइजर से सेनिटाइज करते रहिए आदि-आदि । लेकिन विडम्बना है कि अधिकांश लोगों ने सतर्कता अपनाने जैसी जरूरी और महत्वपूर्ण बात की पूरी तरह से अवहेलना करते हुए लॉकडाउन खुलने का अर्थ केवल ये लगा लिया है कि जैसे अब कोई खतरा बचा ही नहीं है और शारीरिक दूरी व अन्य नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाते हुए लोग धार्मिक स्थलों, वैवाहिक समारोहों व बाज़ारों आदि में भीड़ लगाए नजर आ रहे हैं जबकि कोरोना संक्रमण भयावह गति से बढ़ता जा रहा है। प्रयागराज के जिस इलाके में मैं रहता हूँ वहाँ भी यही स्थिति है और मेरे गृह जनपद मऊ की भी यही । केवल इन दो स्थानों का जिक्र करने का कारण यह है कि प्रयागराज में तो रहता ही हूँ इसलिए यहाँ की स्थिति से रोज सामना हो रहा है और गृह जनपद से इतना जुड़ाव है कि वहाँ के हालात पर यहीं से सोशल मीडिया के माध्यम से लगातार नजर बनाए रखता हूँ । खैर…. बात अपने गृह जनपद, अपने गाँव-जवार की करते हैं । आज 29 जून को पिछले 48 घंटे में कोरोना के 16 नए मामले आए हैं और पूरे जिले में आज की तारीख तक कोरोना के कुल 116 मामले हैं जिसमें से 65 मरीज ठीक हो चुके हैं और 48 मरीज एक्टिव हैं । 03 मरीजों की मौत हो चुकी है । उल्लेखनीय है कि इन तीनों लोगों के कोरोना पॉज़िटिव होने की रिपोर्ट उनकी मृत्यु के बाद आई । स्पष्ट है कि कोरोना का कोहराम वहाँ भी जारी है। लेकिन अधिकांश लोगों पर इसका बहुत असर नहीं दिखता। लोग कोरोना पूर्व जैसी स्थितियों में ही रहने लगे हैं। न मास्क, न दो गज की शारीरिक दूरी। शादी-विवाह में वही लगभग पहले जैसा ही जुटान और द्वारपूजा, जयमाल के स्टेज तथा विवाह के मंडप में पहले जैसी ही भीड़ और चहल-पहल । मेरे गाँव के आस-पास से आज कल फेसबुक पर शेयर किए जा रहे फोटोग्राफ्स तो यही कहानी बयान कर रहे हैं। कुछ लोगों से बात की तो यही कहते दिखे “सरकार त सब खोल दिहले बा, अब कहाँ रोक-टोक बा कउनो । इहाँ त अब केहू ना पहिनत ह मास्क-ओस्क । सब त अब पहिलहीं के तरे रहत ह” । जो समाज सेवक लोग अप्रैल माह में लोगों को गमछा,मास्क और सैनिटाइजर बाँटते हुए कोरोना से बचने के उपाय समझा रहे थे, अब गमछा और मास्क उनके चेहरे से ही गायब हो चुका है। तो ये स्थिति है। एक वरिष्ठ नागरिक और गाँव के समझदार व्यक्ति हमको ही सपरिवार गाँव आने के लिए समझाते दिखे। “लइकन-बच्चन के गाँव घुमा द ला के, अब सब खुल गइल ह, चलि आवा, अब का दिक्कत ह,गाड़ी-मोटर सब त चलत ह अब” । ये 65+ उम्र वाले वरिष्ठ नागरिक कुछ दिन पहले किराए की गाड़ी और ड्राइवर के साथ किसी के दाह-संस्कार में शामिल होकर बनारस से इस अफसोस के साथ लौटे हैं कि अगर उस दिन बारिश नहीं होती तो बनारस के अन्य रिश्तेदारों के घर जाकर भी मिलना-जुलना कर लिए होते। मैंने तो चुपचाप उनकी बात सुनते हुए बस बारिश को धन्यवाद किया । आवश्यक सतर्कता बरते बिना बनारस, गोरखपुर, लखनऊ, प्रयागराज आदि शहरों से लोगों का आवागमन हो रहा है । गाँव के मंदिर पर ली गई एक फोटो किसी के फेसबुक पर दिखी जिसमें एक दरोगा जी बिना मास्क के और दो गज की शारीरिक दूरी का पालन किए बिना कुछ लोगों के साथ चिपके हुए पोज दे रहे हैं, फोटो में दरोगा जी सहित किसी भी व्यक्ति के चेहरे पर मास्क मौजूद नहीं है और दो गज की दूरी तो ……. । फेसबुक पर विवाह जैसे समारोहों की कई फोटो दिख रही हैं जिसे देखकर कहीं से भी नहीं लगता कि ये कोरोना काल की तस्वीरें हैं।
ये स्थितियाँ भयावह हैं, कोरोना अपनी पूरी रफ्तार से आगे बढ़ रहा है और लोग ये मान बैठे हैं कि संक्रमण उन तक नहीं पहुंचेगा, इसलिए आवश्यक सावधानी नहीं बरत रहे । परंतु कहा गया है कि “सावधानी हटी, दुर्घटना घटी”। इसलिए लापरवाह और बेपरवाह मत बनिए। समाज सेवी और समाज के जिम्मेदार लोगों से हाथ जोड़कर विनम्र निवेदन है कि चूंकि आप लोग गाँव-देहात के लिए मार्गदर्शक की भूमिका अदा करते हैं और लोग आप लोगों का अनुगमन भी करते हैं, तो इसलिए आप लोग स्वयं भी मास्क पहनें, दो गज की दूरी रखें और अन्य सावधानियाँ बरतें तथा लोगों के लिए आदर्श बनें । जो जोश आपने अप्रैल में दिखाया था, अब उससे ज्यादा जोश से लगने की जरूरत है। खतरा टला नहीं है, और बढ़ रहा है। संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए सरकार हरदम लॉकडाउन नहीं रख सकती । सरकार और प्रशासन ने आपको बचने के तरीके बता दिये हैं। अब आपकी ज़िम्मेदारी है कि आप उन्हें अपनाएं। एक महत्वपूर्ण बात और… इस मामले में जब आप लापरवाही करते हैं तो उससे हो सकने वाला दुष्प्रभाव केवल आपको ही प्रभावित नहीं करता, दूसरे लोग भी उससे प्रभावित होते हैं। इसलिए इस मामले में लापरवाही करने वाले को “मत मानो, भाड़ में जाओ” कह कर भी नहीं छोड़ा जा सकता । कहा गया है कि “अपने हाथ तानने की हमारी स्वतंत्रता वहीं खत्म हो जाती है जहाँ से दूसरे की नाक शुरू हो जाती है।” इसलिए विनम्र अपील है कि कृपया अपने हाथ तानने से पहले दूसरों के नाक के बारे में जरूर सोचिए।

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