उत्तर प्रदेश

वोट की चाहत में ओमप्रकाश के बयान पर आहत नहीं हो रही भाजपा!

@आनन्द कुमार…

मऊ। ओमप्रकाश राजभर राजनीति का वह नाम जिसने जब चाहा जिस दल के नेता को जो बोला, जिससे मन किया हाथ मिलाया, जिससे मन किया हाथ छुड़ाया!
अशब्द बोलने के बाद भी लोग जिससे गठबंधन करने व मंत्री पद सौंपने को आतुर होते हैं चाहे वे विश्व की सबसे बड़ी राजनैतिक दल बनने का दंभ रखने वाली भाजपा हो, या यूपी की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाली सपा! लेकिन वे भी इस छोटे से दल वाले राजनेता के आगे नतमस्तक है! या यूं कह लीजिए राजनीति में जब चाहे जैसे चाहा, अपने से बड़े कद वाले राजनेता को सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के मुखिया ओमप्रकाश राजभर ने नचाया, छकाया और घुमाया!
राजनैतिक दल के नेता चाहे वे भाजपा के हों या सपा के सब ने अपने-अपने हिसाब से ओमप्रकाश राजभर से गलबहियां करते रहें, लेकिन ओमप्रकाश राजभर अपने-अपने हिसाब से, उनसे दिल लगाया और जब जी भर गया तो दिल से दूर भी किया! नेताओं पर जुबानी हमलें के बाद भी, भले ही राजनीतिक दल के बड़े चेहरे ओमप्रकाश राजभर को माफ कर पुनः अपने गले लगाया, लेकिन जनता जो वसूल की राजनीति करती है, जिसे ओमप्रकाश राजभर की बेतूकी बेबाकी पसंद नहीं है, उसने ओपी राजभर को कभी माफ नहीं किया!
दल के बड़े व छोटे नेता भले ही अपने राजनैतिक आकाओं के सम्मान और पार्टी लाइन में बंध कर ओमप्रकाश राजभर के बयान को अनदेखी कर उनके सम्मान में खड़े हो रहे हैं, लेकिन वे कितने अड़े हैं यह जानना और समझना इतना आसान नहीं है!
तभी तो अपने पुत्र अरविन्द राजभर के लिए घोसी की जनता का समर्थन पाने के लिए ओमप्रकाश राजभर को एड़ी से चोटी लगानी पड़ रही है और रास्ते आसान होते नजर नहीं आ रहे हैं!
बेतुके बोल के राजनीति के माहिर खिलाड़ी ओमप्रकाश राजभर, अपने बेटे अरविन्द राजभर को लोकसभा चुनाव में घोसी बायां दिल्ली के नए संसद में भेजने की फिराक में हैं। जनता की अदालत में शेर का बेटा शेर की बात कहकर भी, वे ऐसा ही कुछ कहीं न कहीं बोल जा रहे हैं जिससे नुकसान हो रहा है कि फायदा घोसी की राजनीति की बारीक समझ रखने वाला ही समझ सकता है! लेकिन यह बात न ओमप्रकाश राजभर को समझ में आ रही और ना ही उनके बेटे को उठक बैठक कराने वाली भाजपा को!
इतना ही नहीं, जनता के बीच कमल नहीं छड़ी निशान की बात हो, या फिर विधानसभा चुनाव 2022 में सदर सीट पर विधायक चुनने का इशारा, या मुख्यमंत्री योगी जी द्वारा सौंपे गए मंत्रीमंडल के विभागों की बात हो, ओपी राजभर हर बात को भुनाने में लगे हैं, तभी तो पावर तक की बात कह डाल रहे हैं! इतना ही नहीं ओपी राजभर सीधे हाटलाईन पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह व मुख्यमंत्री योगी से जुड़े होने और बात करने के रिश्तों को कहते फिर रहे हैं और भुनाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन असहजता तब हो जाती है, जब भाजपा और जनता के लोग ही सवाल करते हैं कि इन बड़े नेताओं तक ओमप्रकाश राजभर के बयान के वीडियो नहीं पंहुचते हैं क्या जो, वे इनके बकवास और बेइज्जती को सहते हैं!
जबकि अगर इन पहलुओं पर अध्ययन कर बात किया जाए तो भाजपा ओमप्रकाश राजभर के उल जलूल बयां को इस लिए सहती है कि घोसी के अलावा उसकी दर्जनों लोकसभा की सीट पर नजर है, जहां ओमप्रकाश राजभर के पार्टी का प्रभाव है, और वे भाजपा के प्रत्याशी के लिए अमृत साबित हो सकती है। वहीं घोसी में अपने बेटे अरविन्द राजभर को सुभासपा व भाजपा का प्रत्याशी बनाकर संसद भेजने का मंशा काफी मशक्कत वाला लग रहा है, अन्दरखाने ही चुनाव का माहौल घोसी विधानसभा के उपचुनाव सरीखा होता जा रहा है। जनता बोल रही है कि उपचुनाव में तो दारा सिंह चौहान को हराया गया, लेकिन अपनी बोल पर नियंत्रण खो चुके ओपी राजभर को जुबां की कीमत क्या होती है यह ज्ञान कराने का सबसे अच्छा मौका लोकसभा चुनाव है।
खैर राजनीति अपने उबाल पर है हर दल के लोग अपने-अपने प्रत्याशी की बात कर रहे हैं, कुछ नाराज हैं तो सार्वजनिक स्थानों पर अपने पार्टी को जीता रहे हैं, लेकिन वोटर के बीच चुप्पी साध रखें हैं। वहीं घोसी का सांसद कौन होगा, वे वोटर कुछ भी नहीं बोल रहे हैं जिनकी राजनीति हलचल से दूरी है।

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