पुण्य स्मरण

पुनरुत्थान के मार्गी एवं युवाओं के प्रेरणास्रोत! स्वामी विवेकानंद!

Art by PRASIDDHI ANAND, SUNBEAM SCHOOL, MAU

#Alok Pratap Singh DO
ICDP Cooperative, Ambedkar Nagar

@ आलोक प्रताप सिंह…
आज 12 जनवरी को भारत अपने सपूत स्वामी विवेकानंद की जयंती मनाएगा लेकिन क्या वह भारतीय जीवन शैली उसकी रीढ़ की हड्डी और अस्मिता को पहचान पाएगा?
क्या वह मानव जाति का आध्यात्मिकरण अपने इस आधुनिक जीवन मार्ग से ढूंढ पाएगा? क्या वह नष्ट करो कि विघटनकारी संसार का कोई भला कर पाएगा? अगर हां तो फिर आवश्यक है जानना उस राष्ट्रपूत के पुनरुत्थान की पुनर्जागरण यात्रा को।
आइए समझते हैं स्वामी विवेकानंद के संकल्प एवं “उठो जागो और दौड़ो की कहानी को जब 11 सितंबर 1893 की धर्म सभा की पुनर्जागरण यात्रा जिसमें उन्होंने धर्म को सर्वोपरि रखकर कहा था धर्म में ही भारत के प्राण हैं और जब तक हिंदू जाति अपने पूर्वजों की धरोहर को नहीं भूलती विश्व की कोई भी शक्ति ऐसी नहीं है जो उसे नष्ट कर सके। जब तक शरीर का रक्त शुद्ध और सशक्त रहता है, उस शरीर में किसी रोग के कीटाणु नहीं रह सकते। हमारे शरीर का रक्त आध्यात्म है जब तक यह निर्बाध गति से सशक्त शब्द तथा जीवंतता से प्रवाहित होता रहेगा सब कुछ ठीक-ठाक रहेगा।
राजनीतिक सामाजिक और दूसरे कई बड़े दोष यहां तक कि देश की दरिद्रता भी सब ठीक हो जाएंगे यदि रक्त शुद्ध है। हमारी जाति का लक्ष्य कभी राजनीतिक महानता नहीं रहा वह कभी नहीं रहा और कभी नहीं रहेगा। हम देखते भी हैं कि भारतीय जाति कभी संपदा जुटाने में रत नहीं रही यद्यपि हमने अपार संपदा प्राप्त की इतनी संपदा जितनी कोई अन्य देश नहीं जुटा पाया होगा।
तथापि यह देश संपदा का पक्षधर नहीं रहा यह सदियों से एक सशक्त जाती रही परंतु हम देखते हैं कि यह देश कभी सत्ता का पक्षधर नहीं रहा। कभी दूसरे देश को जीतने नहीं गया। भारत को कभी साम्राज्य की भूख नहीं रही इस जाति के आदर्श सत्ता और संपदा कभी नहीं रहे मैंने थोड़ी सी दुनिया देखी है पूर्व पश्चिम की जातियों में गया हूं सर्वत्र मैंने पाया कि हर राष्ट्र का अपना अपना आदर्श होता है जो उसकी रीढ़ की हड्डी का काम करता है उसे उस जाति की रीढ़ की हड्डी कहा जाना चाहिए किसी देश की रीड की हड्डी राजनीति होती है, किसी की सामाजिक संस्कृति, किसी की बौद्धिक संस्कृति इत्यादि परंतु हमारे भारत माता का आधार एवं उसकी रीढ़ की हड्डी धर्म है और केवल धर्म, क्योंकि इसी चट्टान पर इसके संपूर्ण जीवन का विशाल प्रसाद खड़ा है”

भारतीय जीवनशैली का यही तत्व है उसके साथ शुद्ध संगीत की यही धुन है उसकी रीढ़ की हड्डी यही है यही उसकी न्यू है उसकी अस्मिता का दूसरा कारण है मानव जाति का आध्यात्मिकरण।
अपने इस मार्ग से वह कभी विचलित नहीं हुआ है शासन चाहे तार तार का हो तुर्कों का हो या मुगल शासन करें या अंग्रेज। समाज सुधार एवं पुनरुत्थान जागरण यात्रा में भारत भ्रमण के दौरान उन्होंने कई तर्क दिए जैसे–
विघटन (नष्ट) मत करो का नारा तो ऐसे फला फूला मानो भारत ही नहीं तमाम दुनिया ने इसे स्वीकार किया कि अपने इतिहास अपनी सांस्कृतिक उपलब्धता एवं राजनीतिक विरासत को नष्ट नहीं करना है क्योंकि यही किसी भी देश की सामाजिक आर्थिक उन्नति का आधार होता है, उचित भी है विघटनकारी संसार का कभी भला नहीं करते उनका मानव मात्र एवं मानव कल्याण से कोई लेना देना नहीं होता उनका केवल एक पक्ष मजबूत होता है वह है नष्ट करना।
तार्किकता से देखें तो आज पूरा पश्चिम ने जो अत्याचार और उपनिवेशवाद की नीति पूर्वोत्तर राष्ट्रों पर अपनाएं वहां की सांस्कृतिक एवं राजनीतिक विरासत को नष्ट किया यह पुनरुत्थान का कभी परिचायक नहीं रहा। “तोड़ो मत गिराओ मत कुछ बनाओ निर्माण करो हो सके तो सहायता करो ना हो सके तो हाथ जोड़ लो और जो हो रहा है उसे खड़े होकर देखो आप सहायता नहीं कर सकते तो हानि भी मत पहुंचाईऐ मानव जहां है वहीं से उसे सहारा दीजिए।

“जनसाधारण का उद्धार कीजिए उसकी आस्था को ठेस पहुंचाए बिना स्मरण रहे कि देश झोपड़ियों में बसता है किसी देश का प्रारब्ध वहां की जन सामान्य की दशा पर निर्भर करता है क्या आप उसका उत्थान कर सकते हैं? क्या आप उन्हें उनके सहज आध्यात्मिक सभाओं को हानि पहुंचाए बिना उनका खोया अस्तित्व लौटा सकते हैं यह वाक्य नहीं है” यह धर्म सभा की व्याख्यान में पाश्चात्य सभ्यताओं को आईना दिखाने जैसा है कि तुमने दुनिया पर राज तो किए परंतु हमारी तरह कभी जन जागरण यात्रा एवं धर्मगुरु की उपाधि नहीं ले पाए। सबसे बड़ा कारण था तुम्हारी उपनिवेशवाद की नीति उस राष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत को तोड़ना एवं वहां की प्राकृतिक संपदाओं का दोहन।
अपने उपयोग में लिए गए उस राष्ट्र के संसाधन वह राष्ट्र तुम्हारा रीड़ी ना हो करके तुम्हें निखरने एवं प्रखर होने का उल्लास देता है। यही कारण रहा कि आज उपनिवेशवाद की गर्त में ऑटोमन, मेसोपोटामियन, फारसीयन और यहूदियन सभ्यताओं ने अपने आप को नष्ट कर दिया, एक बचा तो केवल भारतीय विरासत जिसका आधार था धर्म और वसुधैव कुटुंबकम। कभी भी किसी भी राष्ट्र के समाज सुधार में धर्म को विकृत करने की आवश्यकता नहीं है समाज की वर्तमान अवस्था का कारण धर्म नहीं है बल्कि धर्म को समाज पर सही रूप से लागू कहीं नहीं किया गया जिसके कारण आज अपयश और गुलामी जैसी बेड़ियों से ठोकर खाकर गुजारना पड़ा।

“भूतकाल से ही वर्तमान का निर्माण होता है इसलिए जितना हो सके मुड़कर देखो पीछे छूट गए सास्वत झरनों काजल पियो और इसके बाद आगे देखो आगे बढ़ो और सदैव भारत को प्रकाशमान एवं महान बनाओ और इतना ऊंचा ले जाओ जितना वह कभी रहा भी ना होगा। हमारे पूर्वज महान थे हमें इसे पुनर जागृत करना होगा हमें अपने अस्तित्व तत्वों को पहचानना होगा अपनी शिराओं में बहते रक्त को जानना होगा हमें भारत को उससे भी महान बनाना होगा जितना महान वह कभी रहा भी ना हो”
यह उस राष्ट्र सपूत के शब्द थे अपने अतीत के बारे में अपने उस भारत के इतिहास के बारे में जो 10000 साल से ऐसे ही मूर्तिमान स्तंभ की तरह खड़ा रहा सभ्यताओं की शुरुआत और पतन होते रहे परंतु यह सदैव सभ्यताओं की प्रतिमूर्ति बनकर उभरता रहा अपनी संप्रभुता एकता और विद्वता के दम पर।
राष्ट्र निर्माण में सर्वोपरि होती है उस राष्ट्र की भूतकालीन संस्कृति एवं सामाजिक सुधार, समय-समय पर सामाजिक सुधार एवं विचारों के आमोद प्रमोद ही किसी राष्ट्र की निर्माण की नींव रखते हैं।
यह राष्ट्र श्रीराम, श्री कृष्ण, महावीर, रामकृष्ण इत्यादि का देश है जहां मर्यादा, त्याग, बलिदान, स्त्री महत्व को स्थान दिया गया ना की राजनीति और उपनिवेशवाद को शायद यही कारण रहा महान सम्राट अशोक के प्रतापी होने पर भी वह भारत के बाहर अपनी राजनीतिक विरासत को फैलाने नहीं गया।

राष्ट्र निर्माण में सबसे बड़ा योगदान वहां की युवा पीढ़ी एवं उनके शिक्षण संसाधनों से तय होता है, 14 15 वी शताब्दी में यूरोप में चली उद्योग बाद की क्रांति ने पूरे यूरोप में आधुनिक शिक्षा की नींव रखी पुराने संसाधनों को झकझोर कर रख दिया।
सुख सुविधाओं से लैस उनके शिक्षण संस्थानों ने दुनिया में भूचाल ला दिया, देखते ही देखते दुनिया औद्योगिकीकरण की तरफ बढ़ती हुई उपनिवेशवाद की और विस्तार वाद की नीतियों पर चलकर मध्य यूरोप से लेकर पश्चिमी एशिया एवं पूर्वी एशिया फैल गई उन्होंने शिक्षा और ज्ञान पर जोर देकर कहा कि
“केवल जानकारी का ढेर शिक्षा नहीं कहला सकता जिसे तुम्हारे दिमाग में ढूस कर भर दिया जाता है और जो बिना आत्मसात हुए वहां जीवन भर उपद्रव मचाया करता है, हमें विचारों को इस प्रकार आत्मसात कर लेना चाहिए कि उनके द्वारा हमारा जीवन निर्माण हो सके हमारा चारित्रिक गठन हो सके और हम मनुष्य बन सके यदि तुम केवल 5 ही भावों को आत्मसात कर तदनुसार अपने जीवन और चरित्र का गठन कर सको तो उस मनुष्य की अपेक्षा कहीं अधिक शिक्षित हो जिसने एक पूरा का पूरा पुस्तकालय कंठस्थ कर रखा हो”

स्वामी विवेकानंद ने इस बात को अच्छी तरह समझा की आधी आबादी यानी महिलाओं को जब तक शिक्षित नहीं किया जाएगा तब तक देश की उन्नति और कोई भी क्रांति संभव नहीं है इसलिए उन्होंने पाश्चात्य शिक्षा और तकनीक पर भी बल दिया पर भारतीय सनातन आदर्श और उस नैतिक बल पर डटे रहने की शर्त के साथ सर्वप्रथम महिलाओं को स्वतंत्रता एवं सुशिक्षित बनाने की कल्पना के साथ उन्होंने हस्तक्षेप का अधिकार भी दिया इस सोच के साथ कि भारत की पुनरुत्थान यात्रा में नारियां भी कंधे से कंधा मिलाकर हर लड़ाई में साथ चल सके उनको ऐसी शिक्षा दी जाए जिससे विन निर्भय होकर भारत के प्रति अपने कर्तव्य को भलीभांति निभा सकें।

उनके विचारों में रामकृष्ण परमहंस लोकमान्य तिलक रवींद्रनाथ टैगोर एवं न जाने कितने महान विभूतियों ने अपने आप को पाकर धन्य समझा उनकी धैर्यशीलता, बुद्धिमता,
तर्कशीलता का प्रमाण यह दुनिया देख चुकी है, जरूरत है तो बस उनके आदर्शों विचारों को आत्मसात करने की उनके विचारों को सतत बढ़ाने की क्योंकि उन्होंने एक बार अपने भाषण में कहा था कि “तुम बस विचारों की बाट ला दो बाकी प्रकृति स्वयं संभाल लेगी” उनके इस मंत्र ने पूरी दुनिया को भारत की सनातन शक्ति, धर्म अध्यात्म और विचारों से ओतप्रोत समाज की ओर आकृष्ट होने पर विवश कर दिया।
पाश्चात अपनी भौतिकतावाद, चमक-दमक में अव्वल होकर भी जीवन दर्शन एवं परतंत्र की यात्रा में पिछड़ा ही रहा।
वह स्वामी जी के विचारों के बाद ही समझ पाया इस संसार में भारत ही एक ऐसा राष्ट्र है जहां के संस्कार आज भी वहां के लोगों में प्रबल हैं और यह उत्कृष्ट समाज की सबसे बड़ी निशानी होती है जो अपनी शुरुआत किसी भी रूप में कहीं से करने में सक्षम होती हैं।
उनके विचारों में समाज की एकता में ही भारत की एकता समाहित थी वह कहा करते थे कि हे भारत तुम मत भूलना कि तुम्हारी स्त्रियों का आदर्श सीता सावित्री दमयंती हैं मत भूलना कि तुम्हारे पास सर्व त्यागी उमानाथ शंकर हैं मत भूलना कि तुम्हारा विवाह तुम्हारा धन और तुम्हारा जीवन इंद्रिय सुख व्यक्तिगत सुख के लिए नहीं है”ऐसे तमाम विचार जिसने पाश्चात्य सभ्यताओं को झकझोर कर रख दिया अध्यात्म का दर्शन कराया।
जिनकी संवेदना और विचारों को जवाहरलाल नेहरू से लेकर महात्मा गांधी तकने इस रूप में स्वीकार किया कि अगर उनके विचार शतक हमारे मस्तिष्क में रहे तो हमें स्वराज स्थापना के लिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। आज भारत के युवाओं को जरूरत है उनके विचारों को, उनकी कृतियों को समझने की जिससे राष्ट्र निर्माण एवं उन्नति का मार्ग प्रशस्त हो सके।

आलोक प्रताप सिंह…
लेखक आलोक कुमार अम्बेडकर नगर में आईसीडीपी में डेवलपमेंट आफिसर हैं

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