खास-मेहमान

विकास के नाम पर कुछ दे दीजिए, “बाबा”

@ आनन्द कुमार…

मुख्यमंत्री Yogi Adityanath जी,
आज कुछ ही देर में आपका उड़नखटोला मऊ की धरती पर दो ऐतिहासिक स्थानों पर उतरने जा रहा है। पहली लैंडिंग मधुबन की उस शहीदी धरती पर होगी, जिसने देशभक्ति और बलिदान की अमिट गाथाएँ लिखी हैं। दूसरी लैंडिंग ताजोपुर स्थित ब्रिगेडियर डॉ. पी.एन. सिंह सैनिक ग्रामीण अस्पताल में होगी, और ब्रिगेडियर की सेवा और समर्पण देश का प्रतीक है।

आपका आगमन निश्चित रूप से मऊ के लिए गौरव का क्षण है। स्वागत भी होगा, अभिनंदन भी होगा। सड़क, अस्पताल, फायर स्टेशन, दमकल वाहन और अन्य योजनाओं के उद्घाटन-शिलान्यास भी होंगे। ये सब ज़रूरी हैं, इनकार नहीं। लेकिन मुख्यमंत्री जी, सच यह भी है कि मऊ अब केवल छोटे-मोटे उद्घाटनों से संतुष्ट होने वाला नहीं है।

मऊ की सबसे बड़ी ज़रूरत है — रोज़गार, उद्योग और स्थायी विकास।

कभी परदहां और स्वदेशी कताई मिल मऊ की पहचान थीं। पड़ोसी गाजीपुर के बहादुरगंज और बड़ौरा की कताई मिलें भी हजारों परिवारों की रोज़ी-रोटी का आधार थीं। मऊ का साड़ी, धागा और लुंगी उद्योग पूरे प्रदेश में अपनी अलग पहचान रखता था। इन मिलों के चलते न सिर्फ मशीनें चलती थीं, बल्कि हजारों घरों के चूल्हे भी जलते थे।

आज वे मिलें बंद हैं, उनकी चिमनियाँ खामोश हैं, लेकिन उनकी ज़मीनें अब भी वहीं खड़ी हैं — मानो किसी नई शुरुआत की प्रतीक्षा में। घोसी चीनी मिल का वर्तमान हाल भी किसी से छिपा नहीं है। बलिया की रसड़ा चीनी मिल भी इतिहास बन चुकी है।

मुख्यमंत्री जी,
सड़कें विकास का रास्ता बना सकती हैं, लेकिन विकास की असली रफ्तार कल-कारखानों से आती है। छोटे व्यवसाय लोगों का पेट तो पाल सकते हैं, लेकिन किसी जिले की आर्थिक तस्वीर नहीं बदल सकते। जब कोई बड़ा उद्योग स्थापित होता है, तब सिर्फ मजदूर नहीं, पूरा बाज़ार चलता है; सिर्फ रोजगार नहीं, उम्मीद पैदा होती है।

आज मऊ खुद को विकास की दौड़ में कहीं पीछे छूटा हुआ महसूस करता है। लोग पूछते हैं कि डबल इंजन सरकार के इतने वर्षों में मऊ को ऐसा कौन-सा बड़ा उद्योग मिला, जिसने आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बदल दिया?

आप कह सकते हैं कि हजारों करोड़ की योजनाएँ दी गईं। लेकिन मुख्यमंत्री जी, जनता भी तो टैक्स के माध्यम से सरकार का खजाना भरती है। सड़क, बिजली, पानी, अस्पताल और सुरक्षा देना सरकार की जिम्मेदारी है, कोई एहसान नहीं। असली पहचान तो तब बनेगी जब सरकार किसी जिले को आत्मनिर्भर और रोजगारयुक्त बनाए।

एक दशक सत्ता में रहने के बाद आज मऊ यह जानना चाहता है कि उसके हिस्से में ऐसा कौन-सा “मील का पत्थर” आया, जिसे आने वाली पीढ़ियाँ याद रखेंगी?

मऊ तुलना नहीं करना चाहता, लेकिन सवाल जरूर पूछता है। अगर पिछली सरकारें विकास की गति नहीं दे पाईं, तो वर्तमान सरकार को उनसे आगे निकलकर दिखाना चाहिए। इतिहास केवल भाषणों से नहीं, फैसलों से लिखा जाता है।

मुख्यमंत्री जी,
मऊ को घोषणाओं से ज्यादा विश्वास चाहिए।
शिलान्यास से ज्यादा उद्योग चाहिए।
सम्मेलनों से ज्यादा रोजगार चाहिए।

मऊ की युवा पीढ़ी पलायन नहीं, अवसर चाहती है। बंद मिलों में फिर से मशीनों की आवाज़ सुनना चाहती है। करघों की नगरी फिर से अपने स्वर्णिम दौर में लौटना चाहती है।

इसलिए आज, जब आप मऊ की धरती पर कदम रख रहे हैं, तो इस जनपद की जनता की ओर से बस इतनी-सी विनती है—

“मुख्यमंत्री जी, विकास के नाम पर मऊ को कुछ ऐसा दे दीजिए,
जो आने वाले वर्षों में इस जिले की तकदीर बदल दे…
बस आपसे यही कहना है मऊ के के विकास के नाम पर कुछ दे दीजिए ‘बाबा’!”

One thought on “विकास के नाम पर कुछ दे दीजिए, “बाबा”

  • Dr Gulabchand Patel

    बहुत ही सुंदर आलेख
    बिकास सिर्फ रोड रास्ते और पुल निर्मान से नहीं देखना है किन्तु युवा शक्ति को रोजगार चाहिए, पहली शर्त है रोटी कपड़ा और मकान

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *