रचनाकार

हम ख़ुद तय करेंगे

मैं पत्नी के साथ बाजार में घूम रहा था, घर के लिए कुछ जरूरी सामान लेना था। अचानक से वह एक कपड़े की दुकान के सामने रुक सी गई। दुकान के शोकेस में एक पुतला बहुत ही ख़ूबसूरत सूट पहने खड़ा था। महिलाओं को रंगों और डिज़ाइनों से ज्यादा ही प्यार होता है। वे प्रकृति ने पुरुष से अधिक सुंदर और परिष्कृत जो बनाई हैं।

“क्या हुआ ? ये तुमसे तो ज्यादा सुंदर नहीं है। और वैसे भी पुतला है, इस पर तुम्हारे मुँह बनाने का भी कोई असर नहीं होगा।” मैंने हँसते हुए कहा।

“छोड़ो भी, जब देखो छेड़ते रहते हो। मुझे ये सूट बहुत पसंद है….पर आजकल तो श्राद्ध चल रहे हैं। इसे मैं खरीद नहीं सकती।” पत्नी ने मायूस होते हुए कहा।

“अरे! श्राद्ध चल रहे हैं …. क्या मतलब है ? पसंद है तो ले लो । पर्स तो मेरी जेब में है, और मेरे साथ आकर भी मन मसोसकर रह जाओ, ये मुझे बर्दाश्त नहीं।” और मैं पत्नी का हाथ पकड़े दुकान में चढ़ने लगा।

“रुको …तुम कुछ मानते ही नहीं हो। जब देखो पुरातन परम्पराओं का अनादर करते हो।” पत्नी ने हाथ खींचते हुए कहा।

“हा हा हा …. परम्पराएँ आदमी की बेहतरी के लिए बनाई गई हैं। पर कुछ परम्पराएँ आज के समय में फिजूल और बेकार हैं जिन्हें हम ढो रहे हैं बिना तर्क और सोच विचार किए। श्राद्ध हैं ऐसा कहकर तुम अपना मन मार रही हो, माँ- बाबूजी दोनों ज़िंदा हैं तुम्हारे , और मैंने मेरे माँ-बाबूजी को खूब खिला-पिलाकर विदा किया दुनिया से, क्योंकि मेरे बाबू जी कहते थे कि स्वर्ग-नर्क आदमी की बुराइयों को कंट्रोल करने के हथियार हैं, मैं श्राद्ध खाने नहीं आऊँगा …जो खिलाना है जीते जी खिला दे। अभी तक दुनिया में कोई कूरियर नहीं बना जो मुर्दों को खाना खिला सके या उन तक पहुंचा सके किसी स्वर्ग और नर्क में जाकर , और मेरे बाबा तो मुर्दाख़ोर, गंदगी पसंद कौए को यम का दूत कहते थे …हा हा हा …फिर बेकार ही बेबकूफ क्यों बनते हो ? जरूरतमंदों और निराश्रितों में अपने पूर्वजों को देख, मानवता के नाते उनकी मदद करो, तुरंत सकून और सुख मिलेगा ऐसा उनका विश्वास था और और मैं भी मानता हूँ । यही प्रत्यक्ष देवता बनने की सबसे सरल विधि है। अब मैं तो पतिपरमेश्वर हूँ, तुम्हें उदास कैसे कर सकता हूँ, तुम तो हृदयस्वामिनी हो।” मैंने कहा।

“फिर भी डर लगता है, पित्र अगर कुपित हो गए तो ?” पत्नी ने शंका जताई।

“हा हा हा ….. क्या अपने भी अपनों को सताते हैं , उनका बुरा चाहते हैं ? जो अपनों से प्रेम करता है वह उन्हें कैसे परेशान कर सकता है ? वह उनका अनिष्ट कैसे कर सकता है ? कैसे उनकी हँसी की राह में रोड़ा बन सकता है ? आओ! अपना भी मन मत मारो ….यह स्वयं के प्रति हिंसा है और मेरे प्रति भी।” मैंने कहा।

“कहते तो तुम सही और तर्कसंगत हो। मगर एक शर्त है ।” पत्नी ने कहा।

“जो कहो सो मंजूर ….. बस अगले जन्म में किसी और से शादी करने का वचन मत लेना ….हा हा हा।”

“धत्त ….ऐसी समझते हो क्या मुझे ? मैं तो कह रही थी कि श्राद्ध तुम करने नहीं देते , मानते हो नहीं ऐसी परंपरा को …तो क्या मैं आज ही घर लौटने से पहले कुछ लोगों को अपनी पसंद का कुछ खिला दूँ ?” पत्नी ने कहा।

“हाँ, फल, ब्रेड पकौड़े रास्ते में ही मिलेंगे और जरूरतमन्द भी। असली श्राद्ध हमारी आस्था और श्रद्धा मानवीयता, पशु-पक्षियों और प्रकृति के संवर्धन में है, और ये किसी महीने या समय की मोहताज नहीं होनी चाहिए। जो लोग समय को बुरा या भला कहते हैं वे स्वयं इस बात से अनभिज्ञ हैं कि मृत्यु का और जन्म का कोई मुहूर्त नहीं होता ….तो हमारी खुशी का मुहूर्त निकालने वाले वे कौन होते हैं ? अपनी खुशी का मुहूर्त हम ख़ुद तय करेंगे।” और हम दोनों मुस्कुराते हुए दुकान में दाखिल हो गए नया सूट खरीदने के लिए।

शब्द मसीहा

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